Emergency: इमरजेंसी लागू करने से पहले पार्टी में अंतरिम PM बनने की होड़ को इंदिरा गांधी ने कैसे रोका?

सत्तर के दशक में एक समय ऐसा भी था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश का पर्याय भी कहा जाने लगा था. किसी और ने नहीं बल्कि उनकी पार्टी के उस समय के कवि हृदय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था, इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा. केवल बरुआ ही क्यों कांग्रेस के तमाम बड़े नेता श्रीमती गांधी की खुशामद में तमाम तरह के कसीदे पढ़ रहे थे. यह तब की बात है जब 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के रायबरेली से लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित करने के साथ ही उनपर अगले छह वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने के लिए रोक लगा दी थी.

इस फैसले और भविष्य की रणनीति को लेकर कांग्रेस पार्टी में उच्च स्तर पर खूब माथापच्ची हुई. दो तरह की राय उभरकर सामने आ रही थी. एक तो यह कि इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक किसी वरिष्ठ नेता को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाना चाहिए जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला इंदिरा गांधी के पक्ष में आने पर पद त्याग कर सत्ता वापस उन्हीं को सौंप दे. पढ़ें शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक, आपातकाल से अमृतकाल के संपादित अंश.

सरदार स्वर्ण सिंह थे पहली पसंद

इंदिरा गांधी की पसंद 1952 से ही केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य रहे सरदार स्वर्ण सिंह थे. लेकिन जगजीवन राम ने यह साफ कर दिया था कि वह इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तो काम करने को राजी हैं लेकिन स्वर्ण सिंह या किसी और का नाम सामने आया तो वह खुद भी दावेदारी पेश कर सकते हैं. इससे अलग, पार्टी में दूसरी राय सुप्रीम कोर्ट में अपील के साथ ही फैसला आने तक इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बने रहने के पक्ष में थी.

इंदिरा गांधी. फोटो: Getty Images

विदेशी लेखिका कैथरीन फ्रैंक ‘इंदिरा: दि लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधी में लिखती हैं, इस सबंध में इंदिरा गांधी ने अपने करीबी विधि विशेषज्ञ और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे से कहा, ‘मुझे त्यागपत्र देना चाहिए.’ जवाब में रे ने कहा कि ‘हड़बड़ी में उन्हें ऐसा कोई फैसला नहीं करना चाहिए.’

कुलदीप नैयर अपनी पुस्तक ‘इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ में लिखते हैं कि महात्मा गांधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद अपने मंत्रिमंडल के तीन वरिष्ठ सदस्यों-जगजीवन राम, यशवंतराव चव्हाण और स्वर्ण सिंह से पूछा था कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक उनका पद पर बने रहना वाजिब होगा! तीनों ने मन की बात मन में मारते हुए कहा कि अगर वह त्यागपत्र देती हैं तो देश में तबाही मच जाएगी. बकौल नैयर, जगजीवन राम ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करना चाहिए. उन्हें लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर केवल एक सशर्त रोक ही लगाएगा क्योंकि ऐसे मामले में पहले कभी उसने स्पष्ट रोक नहीं लगाई थी. वे सोच रहे थे कि विद्रोह के लिए वही उचित समय होगा.

कांग्रेस के अंदर दोमुंही बातों का दौर

पुपुल जयकर ‘इंदिरा गांधी : एक जीवनी’ में लिखती हैं कि उस समय कांग्रेस के भीतर अफवाहों, नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और दोमुहीं बातों का दौर शुरू हो गया था. इंदिरा गांधी से मिलने वाले कांग्रेस के बड़े नेता, वरिष्ठ मंत्री एक तरफ तो उनके प्रति अटूट श्रद्धा और आस्था व्यक्त कर रहे थे, दूसरी तरफ पर्दे के पीछे वैकल्पिक प्रधानमंत्री के रूप में अपने लिए संभावनाएं भी तलाशने में लगे थे. सांसदों के समर्थन का जोड़-घटाव भी चल रहा था. अंतरिम प्रधानमंत्री के लिए वरिष्ठता के हिसाब से जगजीवन राम, यशवंतराव चव्हाण के पक्ष में भी लॉबीइंग शुरू हो गई थी.

Indira Gandhi In Public

इंदिरा गांधी. फोटो: Getty Images

वह लिखती हैं, कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देव कांत बरुआ ने इंदिरा गांधी के सामने सुझाव रखा कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक इंदिरा कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं और वे (बरुआ) उस समय तक के लिए प्रधानमंत्री. फैसला इंदिरा गांधी के पक्ष में आने पर वह उनके लिए प्रधानमंत्री का पद खाली कर देंगे.” लेकिन कहते हैं कि जिस समय प्रधानमंत्री आवास पर यह चर्चाएं चल रही थीं, तभी गुड़गांव में अपनी मारुति फैक्ट्री से लंच के समय वहां आए इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी ने अपनी मां को किनारे ले जाकर समझाया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए. प्रधानमंत्री के रूप में (चाहे वह कार्यवाहक या अल्पकालिक ही क्यों न हो) पार्टी के किसी भी नेता पर भरोसा नहीं किया जा सकता. यही राय इंदिरा गांधी के विश्वासपात्र अतिरिक्त निजी सचिव आर के (राजेंद्र कुमार) धवन की भी थी.

तर्कों से सहमत हुईं इंदिरा

संजय और धवन ने उन्हें समझाया कि त्यागपत्र देने के बाद पिछले आठ वर्षों में खासी मशक्कत से उन्होंने पार्टी और सरकार में अपनी जो निष्कंटक स्थिति हासिल की है, उसे वे तुरंत खो देंगी. इंदिरा गांधी अपने बेटे संजय, विश्वस्त करीबी सिद्धार्थ शंकर रे और धवन के तर्कों से सहमत हो गईं. उन्होंने तय किया कि इस्तीफा देने के बजाय वह इलाहाबाद हाई कोर्ट से मिली बीस दिनों की मोहलत का इस्तेमाल करते हुए इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी और पद पर बनी भी रहेंगी. बकौल पुपुल जयकर, अपने सुझाव पर इंदिरा गांधी की अनुकूल या कहें उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया नहीं मिलती देख बरुआ ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ कहने लगे.

राजनीतिक रणनीति के तौर पर 13 जून को एक बैठक में केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों, कांग्रेस के केंद्रीय पदाधिकारियों, कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों, कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों की ओर से एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर करवाए गए जिसके जरिए इंदिरा गांधी के नेतृत्व में अटूट आस्था व्यक्त करते हुए कहा गया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक राष्ट्र हित में अपने पद पर बने रहने का नैतिक और वैधानिक अधिकार है.

विरोध का स्वर केवल युवा तुर्कों की जमात के मोहन धारिया का था. यह कहने पर कि इंदिरा गांधी को त्यागपत्र दे देना चाहिए, उन्हें जबरन चुप करा दिया गया. धारिया पहले ही इंदिरा गांधी को जेपी से सुलह-समझौते का सुझाव देकर केंद्र सरकार में मंत्री का पद गंवा चुके थे. बाद में धारिया ने बताया था कि उस समय जगजीवन राम, डॉ. कर्ण सिंह, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जे वेंगलराव, कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवराज अरसु भी उनकी ही राय के थे लेकिन बैठक में उनकी तरह बोलने का साहस वे लोग नहीं जुटा सके थे.

समर्थन के बावजूद तनाव में थीं इंदिरा

लेकिन इस तरह के समर्थन के बावजूद इंदिरा गांधी लगातार तनाव में थीं. उन्हें डर लगता था कि उनके अपने लोग भी उनसे दगा कर सकते हैं. 18 जून को कांग्रेस संसदीय दल ने भी एक राय से उनके नेतृत्व में संपूर्ण आस्था व्यक्त करने का प्रस्ताव पास किया. इस बैठक में संसद के दोनों सदनों के 518 सदस्य शामिल हुए. प्रस्ताव में कहा गया कि मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर इंदिरा गांधी का नेतृत्व ही देश के लिए अपरिहार्य है. प्रस्ताव जगजीवन राम ने पेश किया जबकि अनुमोदन यशवंतराव चव्हाण ने किया था.

Indira Gandhi

उद्योगपतियों का भी मानना था कि इंदिरा का प्रधानमंत्री बने रहना जरूरी है. फोटो: Getty Images

उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव रहे बिशन टंडन अपनी पुस्तक ‘पी एम ओ डायरी (भाग एक) दि इमरजेंसी’ में लिखते हैं, “बैठक में चव्हाण ने कहा था, भारत (इंडिया) को जो होता है, वह इंदिरा को होता है और जो इंदिरा गांधी को होता है, वह भारत को होता है. इसी बैठक की अध्यक्षता करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने थोड़ा और आगे बढ़ते हुए कहा था, इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा यानी इंदिरा भारत हैं और भारत इंदिरा.”

इस बैठक में शामिल नहीं होकर चंद्रशेखर, कांग्रेस संसदीय दल के सचिव रामधन, मोहन धारिया, लक्ष्मीकांतम्मा और कृष्णकांत आदि कांग्रेस के युवा तुर्कों ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे. लेकिन इसको खास महत्व नहीं देकर उनके प्रति निष्ठावान लोगों की ओर से कांग्रेस के भीतर और बाहर भी गांधी के समर्थन में जबरदस्त अभियान शुरू किया गया. कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर देशभर में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के विरुद्ध धरना-प्रदर्शनों का आयोजन हुआ. इन धरना-प्रदर्शनों में कहा गया कि देश की जनता अदालत के ऐसे किसी भी निर्णय या फैसले को नहीं मानेगी जो जन भावना के अनुकूल नहीं होंगे.

दिल्ली, हरियाणा और अन्य पड़ोसी राज्यों से भी गाड़ियों, बसों में भरकर आने वाले या कहें लाए जाने वाले ‘कांग्रेसजनों’ ने प्रधानमंत्री निवास के पास आकर प्रदर्शन करने के साथ ही मांग करनी शुरू की कि इंदिरा गांधी को पद छोड़ने की जरूरत नहीं है. वह स्वयं दिन में तीन बार अपने एक सफदरजंग रोड स्थित बंगले से बाहर निकलतीं और उनके समर्थन में आये अथवा लाये गये प्रदर्शनकारियों को संबोधित करती थीं. पूरी दिल्ली इंदिरा गांधी के समर्थन और उनमें आस्था व्यक्त करने वाले पोस्टरों, कटआउटों से पट गयी थी.

आश्चर्यजनक ढंग से इंदिरा गांधी के समर्थन में प्रदर्शन करने वालों में कांग्रेस समर्थक उद्योगपति के के बिड़ला के नेतृत्व में पूंजीपतियों का एक समूह भी था जिसका कहना था कि देश में राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री बने रहना जरूरी है. उद्योगपतियों, पेशेवरों के संगठनों आदि की तरफ से भी उनके समर्थन में बयान दिए अथवा दिलवाए जाने लगे. इस क्रम में ही 20 जून को राजधानी दिल्ली में एक विशाल रैली आयोजित कर इंदिरा गांधी के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन किया गया. इस रैली में इंदिरा गांधी का पूरा परिवार (दोनों बेटे-राजीव और संजय गांधी और दोनों बहुएं-सोनिया और मेनका गांधी) उनके साथ खड़ा था. इस रैली में व्यक्ति पूजा और चाटुकारिता की हदें पार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष देव कांत बरुआ ने एक शेर पढ़ा था,

इंदिरा तेरी सुबह की जय, इंदिरा तेरी शाम की जय,

इंदिरा तेरे नाम की जय, इंदिरा तेरे काम की जय.

(हालांकि 1977 में आपातकाल हटने और चुनाव में इंदिरा गांधी के राजनीतिक पराभव के बाद उनका साथ छोड़ने वालों में असम के कवि हृदय राजनेता देवकांत बरुआ भी थे).

पार हुईं चाटुकारिता की हदें

इंदिरा गांधी के पति स्व. फिरोज गांधी के मित्र रहे देवकांत बरुआ को इंदिरा गांधी ने पहले बिहार का राज्यपाल, फिर केंद्र सरकार में मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था. बरुआ ने आपातकाल के दस वर्ष बीतने पर रविवार साप्ताहिक (23-29 जनवरी, 1985) को दिए एक साक्षात्कार में इंदिरा गांधी के लिए चाटुकारिता की सारी हदें पार करने के बारे में पूछे जाने पर कहा था, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद हुई मीटिंग में सभी नेता इंदिरा गांधी के प्रति आस्था व्यक्त करते हुए उनकी प्रशस्ति में बढ़ चढ़कर कसीदे पढ़ रहे थे. तभी मैंने वह बातें कही थीं.

इंदिरा गांधी ने उस रैली को उस समय तक की सबसे बड़ी रैली करार देते हुए दावा किया कि उसमें दस लाख लोग शामिल हुए. कुलदीप नैयर ‘इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ (पृष्ठ 44) में लिखते हैं, इंदिरा गांधी ने रैली में कहा, कुछ विदेशी शक्तियां और निहित स्वार्थी तत्व न सिर्फ मुझे पद से हटाना चाहते हैं बल्कि जान से भी मारना चाहते हैं. विपक्ष इन शक्तियों से मिला हुआ है. इन तत्वों को मीडिया का समर्थन भी हासिल है. तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर झूठ फैलाया जा रहा है. सवाल यह नहीं है कि मैं पद पर रहूं या ना रहूं, सवाल राष्ट्रीय हितों की रक्षा का है.

रैली के बाद कांग्रेस शासित राज्यों के 13 मुख्यमंत्रियों ने एक समूह के रूप में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलकर उन्हें दिए एक पृष्ठ के ज्ञापन में कहा कि इंदिरा गांधी के त्यागपत्र से न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि राज्यों में भी अस्थिरता फैल जाएगी.

Jagjivan Ram

दलित वोट बैंक को कांग्रेस के पक्ष में रखने में जगजीवन राम की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती थी.

उस समय के राजनीतिक घटनाक्रम बताते हैं कि अदालती फैसले से उत्पन्न राजनीतिक संकट के समय इंदिरा गांधी को पद त्याग करने का सुझाव देने वाले तथा उन नेताओं के साथ भी इंदिरा गांधी के रिश्ते पहले जैसे मधुर नहीं रह गए, जिनके नाम अंतरिम प्रधानमंत्री के लिए उभरकर सामने आए थे. हालांकि इनमें से अधिकतर ने शुरुआती राजनीतिक संघर्ष में इंदिरा गांधी का खुलकर साथ दिया था. जगजीवन राम के लिए उनके करीबी लोगों का यह सुझाव भारी पड़ गया कि बाबू जी के अंतरिम प्रधानमंत्री बन जाने के बाद वह इंदिरा गांधी की प्रतिष्ठा बहाली के लिए समुचित माहौल बना सकेंगे.

जगजीवन राम के बारे में इंदिरा गांधी को आशंका थी कि अनुसूचित जाति के 80 में से अधिकतर सांसदों को लामबंद कर वह कांग्रेस के युवा तुर्कों और विपक्ष, खासतौर से जय प्रकाश नारायण के सहयोग से उनका तख्तापलट कर सत्तारूढ़ हो सकते हैं. जेपी ने उन्हें कुशल प्रशासक होने का तमगा भी दिया था. इंदिरा गांधी उस समय यह कहते हुए सुनी गई थीं कि जगजीवन राम के लिए उन्होंने क्या नहीं किया. उन्हें राष्ट्रपति बनाने की पेशकश की थी. आयकर रिटर्न नहीं भरने पर अभयदान दिया था. उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष और रक्षा मंत्री बनाया लेकिन उन्होंने कभी पूरे मन से उनका साथ नहीं दिया. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बाबू जगजीवन राम ने भी आपातकाल के अंतिम दिनों, फरवरी 1977 के पहले सप्ताह में इंदिरा गांधी और कांग्रेस से किनारा कर लिया था.

Sanjay Gandhi And Indira Gandhi

संजय गांधी मां इंदिरा गांधी के साथ. फोटो: Getty Images

उस समय इंदिरा गांधी इतनी भयाक्रांत और सशंकित हो चुकी थीं कि उन्हें इस बात की भी आशंका थी कि उनके मंत्रिमंडल में शामिल कुछ लोग सीआईए के एजेंट हो सकते हैं. उनके शक और भय का आलम यह था कि उन्होंने उस समय के उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बंगले पर भी जासूसी के लिए आईबी का डीएसपी रैंक का अधिकारी तैनात करवा दिया था. बाद में आपातकाल के दौरान 29 नवंबर, 1975 को बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद से हटा भी दिया गया था. उनकी जगह नारायण दत्त तिवारी राज्य के मुख्यमंत्री बनाए गए थे.

समाजवादी पृष्ठभूमि के नारायण दत्त तिवारी की पूरी कोशिश दिल्ली या कहें आलाकमान और संजय गांधी को खुश रखने की होती थी. उनका एक पैर तब लखनऊ में तो दूसरा दिल्ली में होता था. शायद इसलिए भी उन्हें नई दिल्ली तिवारी भी कहा जाने लगा था. एक बार संजय गांधी के आगरा आने और ताजमहल के रास्ते में हुए अतिक्रमण और रास्ता तंग नजर आने पर उनकी नाखुशी को देखते हुए तिवारी की सरकार ने महात्मा गांधी मार्ग पर बुलडोजरों से अतिक्रमण हटाकर सड़क को बहुत चौड़ी करवा दिया था. आगरा में संजय गांधी के उस दौरे में ही विमान में चढ़ते समय संजय गांधी की चप्पल फिसलकर नीचे गिर जाने पर तिवारी के चप्पल जमीन से उठाकर संजय गांधी के पैर में पहनाने की घटना बहुत चर्चित हुई थी जिसमें तिवारी की बहुत भद्द पिटी थी.

यह भी पढ़ें:राजनीति में राहुल गांधी की चुनौतियां नेहरू-इंदिरा से कठिन क्यों, कब-कहां पर चूके?

जयशंकर गुप्त

जयशंकर गुप्त

प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के पूर्व सदस्य एवं देशबंधु के कार्यकारी संपादक जयशंकर गुप्त देश के नामचीन वरिष्ठ पत्रकारों में शामिल हैं. किशोरावस्था से ही महात्मा गांधी एवं डा. राममनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों से प्रभावित होकर समाजवादी और संपूर्ण क्रांति आंदोलन में शामिल थे. आपातकाल में जेल गए. यह भी एक संयोग रहा कि आजमगढ़ की जेल में आप और आपके पिता, समाजवादी नेता, स्वतंत्रता सेनानी विष्णुदेव एक साथ कैद रहे. आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार से मोहभंग के क्रम में अपनी ही सरकार के खिलाफ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ मिलकर संघर्ष करते हुए जेल गए और फिर सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर 1979 में काशी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता स्नातक की डिग्री हासिल कर सक्रिय पत्रकारिता के मैदान में आ गए. तब से लेकर आज तक एक सजग पत्रकार के रूप में अपने लेखन और उद्बोधन से देश, समाज और राजनीति को आइना दिखा रहे हैं. विभिन्न टीवी चैनलों पर सम सामयिक सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों पर विशेषज्ञ विश्लेषक के रूप में नजर आते हैं.
अपनी 44-45 वर्षों की सक्रिय पत्रकारिता में साप्ताहिक (इंडिया टुडे), रविवार, श्रीवर्षा और असली भारत के साथ ही दैनिक अखबारों-अमृत प्रभात, राजस्थान पत्रिका, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान, लोकमत समाचार और देशबंधु में संवादाता से लेकर संपादक तक के सभी पदों पर काम किया.
पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के साथ संयुक्त अरब अमीरात, सूडान और बुल्गारिया तथा रूस में मास्को, सेंट पीटर्सबर्ग, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड और यूक्रेन जैसे देशों का भ्रमण. ‘ग्लोबल मार्च टू येरूशलम’ के बैनर तले ईरान, तुर्की और लेबनान की यात्रा. इसके अलावा श्रीलंका, अमेरिका, चीन, थाईलैंड, म्यांमार, बांग्लादेश और पड़ोसी नेपाल आदि देशों का भ्रमण. पत्रकारिता के मकसद से देश के भीतर प्रायः सभी राज्यों का सघन भ्रमण किया. संयुक्त राष्ट्र के यूनिफेम आदि संगठनों के साथ मिलकर ह्यूमन ट्रैफिकिंग और जेंडर वायलेंस के खिलाफ सक्रिय रहे. विदेश यात्रा संस्मरणों पर आधारित इनकी पुस्तक ‘दो डग देखा जग’ हाल ही में प्रकाशित हुई है.
1990 के दशक में आप पत्रकारिता के क्षेत्र में बेहद प्रतिष्ठित जयदयाल, रामकृष्ण डालमिया सद्भावना पुरस्कार एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए हिंदी अकादमी, दिल्ली के ‘साहित्यकार सम्मान’ पुरस्कार से सम्मानित किए गये. हिंदी अकादमी, दिल्ली के पूर्व सदस्य. भारत सरकार के मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संस्था प्रेस एसोसिएशन के तीन बार निर्वाचित अध्यक्ष रहे. प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की केंद्रीय प्रेस मान्यता समिति के साथ ही राज्यसभा की मीडिया सलाहकार समिति के सदस्य भी रह चुके हैं.

Read More

google button

Leave a Comment