Asian Games 2026 में भारत: कुछ ठिठके, कुछ बढ़े सशक्त कदम

प्रवीण सिन्हा | पिछले ग्वांगझू एशियाई खेलों में भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 28 स्वर्ण सहित कुल 106 पदक जीते थे। इस बार भारतीय खिलाड़ियों से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद थी।

देश में खेल संस्कृति और सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है तो उनसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद बेमानी भी नहीं है। लेकिन, कई जगह भारतीय खिलाड़ी चीन, जापान और कोरियाई एशियाई खेल महाशक्तियों को चुनौती देने में असफल रहे। हालांकि भारत ने जो 21 स्वर्ण सहित कुल 85 पदक जीते, उनमें भारतीय खिलाड़ियों के बढ़े मनोबल व आत्मविश्वास के साथ सशक्त दावेदारी की साफ झलक दिखी। इस स्थिति में आइची-नागोया एशियाई खेलों में न तो भारतीय सफलताओं को महान उपलब्धि के तौर पर देखना चाहिए और न ही असफलताओं के लिए हाय-तौबा मचाना उचित होगा। हां, वर्तमान स्थिति पर सकारात्मक दृष्टि से विचार करने की जरूर आवश्यकता है।

थोड़ा है, अभी और की जरूरत
भारत का करीबन 500 सदस्यीय दल जापान में कुल 85 पदक जीत सका। क्या गर्व करने के लिए यह उपलब्धि काफी है? 201 खिलाड़ी तो सिर्फ 6 कांस्य पदक जीत पाए, जबकि 137 खिलाड़ियों के खाते में कोई पदक नहीं आया। यह गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि भारतीय दल में कई विश्व चैंपियन और ओलंपिक पदक विजेता शामिल थे जिन्होंने कुछ हद तक देश की लाज रख ली। ज्यादातर खिलाड़ी या तो अनुभव हासिल कर लौटे या फिर सरकार के अथक प्रयास को हताश करते दिखे। 1990 के दशक में महान मिल्खा सहित तमाम खेल विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना था कि अपनी मजबूत दावेदारी पेश करें, पदक जीतने के लिए हाड़तोड़ मेहनत करें ndash; अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में सिर्फ भागीदारी के नाम पर भारत को अपना दल भेजना बंद कर देना चाहिए। हालांकि अभी वैसी स्थिति नहीं है। पिछले 18-20 वर्षों से टीम गेम के रूप में क्रिकेट, हॉकी, कबड्डी सहित व्यक्तिगत स्पर्धाओं में कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, बैडमिंटन, एथलेटिक्स और तीरंदाजी ने तरक्की की राह पकड़ी है और चंद इन्हीं खेलों में भारत अपनी सशक्त दावेदारी पेश कर रहे हैं। इन खेलों में अब भारत सिर्फ भागीदारी के लिए नहीं, पदक जीतने के लिए सशक्त दावेदारी पेश करने जाते हैं। उदाहरण के लिए तीरंदाजी में कुमकुम मोहोद का व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण जीतकर इतिहास रचना, कुश्ती में दो स्वर्ण सहित कुल छह पदक जीतना (सुजीत कलकल और अमन सहरावत ने स्वर्ण पदक की राह में ओलंपिक और विश्व चैंपियनों को हराया), गोल्फ में प्रणवी उर्स का एशियाई खेलों में व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनना, मुक्केबाजी ने भी भविष्य के लिए उम्मीद जगाई। 22 महीने के निलंबन के बाद शानदार वापसी करने वाली परवीन हुड्डा सहित लवलीना बोरगोहेन और अंकुश पंघाल ने स्वर्णिम सफलताएं हासिल कर भारत का झंडा बुलंद रखा। यही नहीं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि – क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी में भारत की महिला व पुरुष दोनों टीमों ने स्वर्ण पदक जीत अपना दबदबा साबित किया।

कुमकुम की ऐतिहासिक राह
खेल महाशक्तियों में शुमार देशों में माना जाता है कि यदि कोई खिलाड़ी 16-18 वर्ष की उम्र में एशियाई खेलों या अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में सफलता हासिल कर ले, तो एक ओलंपिक पदक विजेता के रूप में उनका खिलाड़ी तैयार हो चुका है। कुछ ऐसा ही तो कर दिखाया 17 वर्षीय तीरंदाज कुमकुम मोहोद ने। वर्ष 2009 में जब कुमकुम पैदा हुई थीं, तब तक दक्षिण कोरियाई महिला रिकर्व तीरंदाज पिछले दो दशकों से विश्व तीरंदाजी पर निरंतर शिखर पर थीं। फिर, 9 वर्ष की उम्र में कुमकुम ने जब 2018 में लकड़ी के तीरोंसे इस खेल की विधा सीखनी शुरू की, तब तक दक्षिण कोरियाई महिला रिकर्व टीम लगातार छह बार एशियाई खेलों व ओलंपिक खेलों की चैंपियन बन चुकी थी। …और 4 अक्टूबर, 2026 को 17 वर्षीय कुमकुम जब कांग चेई-यंग को हराकर न केवल महिला व्यक्तिगत रिकर्व एशियाड चैंपियन बनीं, बल्कि दक्षिण कोरियाई महिला रिकर्व टीम के दशकों से चले आ रहे दबदबे को ध्वस्त कर इतिहास रचा। इस ऐतिहासिक पल की नायिका कुमकुम मोहोद भारत की पहली महिला व्यक्तिगत रिकर्व चैंपियन बनीं और उन्होंने एशियाई खेलों में भारतीय टीम को भी पहली बार स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। दर्शक के तौर पर बमुश्किल एक ओलंपिक खेलों की गवाह बनी कुमकुम ने 10 बार की ओलंपिक चैंपियन कोरियाई टीम को मात देकर भारत का मान बढ़ाया। यही नहीं, ओलंपिक खेलों में जलवा बिखेरने वाली कोरियाई स्टार तीरंदाज कांग चेई-यंग को ही अपना आदर्श मानने वाली कुमकुम ने फाइनल में उसी कांग को मात देकर भारतीय तिरंगा लहराया।

जापान में अद्भुत प्रतिभा की धनी कुमकुम और भारतीय तीरंदाजी टीम की उपलब्धियां यादगार साबित हुईं। कुमकुम ने कोरियाई और चीन की विश्व स्तरीय तीरंदाजों को तीन-चार बार मात देते हुए अपनी स्वर्णिम राह पूरी की, जबकि अंकित भक्त और कीर्ति शर्मा के साथ पहली बार भारत को एशियाड महिला रिकर्व टीम स्पर्धा का स्वर्ण दिलाया। भारत ने कंपाउंड व रिकर्व तीरंदाजी में पांच स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य सहित कुल 9 पदक जीते जिससे उसका प्रदर्शन पिछले हांगझोऊ एशियाड के बराबर रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि रिकर्व तीरंदाजों ने सभी पांच स्पर्धाओं में पदक जीते जिसमें दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य शामिल है।

पदक से भटके निशाने
निशानेबाजी अभियान की शुरुआत कई मौकों के हाथ से निकलने और दावेदारों के लड़खड़ाने से हुई। दो बार की ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर का अभियान निराशाजनक रहा और महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल में भारत पदक नहीं जीत सका।पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल टीम भी प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही। सुरूचि सिंह और कमलजीत ने 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण जीत भारत का निशानेबाजी में खाता खोला। हालांकि टीम का माहौल बदलने वाली खिलाड़ी 27 वर्षीय नीरू ढांडा रहीं।नीरू ट्रैप निशानेबाजी में 48 वर्षों बाद व्यक्तिगत एशियाई खेल स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उन्होंने महिला टीम स्पर्धा में रजत और काइनान चेनाई के साथ मिश्रित टीम स्पर्धा में एक और स्वर्ण पदक जीता।निशानेबाजी में भारत के गिरते प्रदर्शन पर गौर करें तो पिछली बार ग्वांगझू में7 स्वर्ण, 9 रजत और 6 कांस्य सहित 22 पदक जीतने वाली भारतीय टीम इस बार जापान से 3 स्वर्णसहित कुल 15 पदक लेकर लौटी। इस स्थिति में सवाल उठना लाजमी है कि क्या नीरू की शानदार उपलब्धियां भारतीय निशानेबाजी कीचिंताओं को पूरी तरह से ढकने में सफल हो सकीं? एक स्पोर्टिंग नेशन बनाने का जो सपना सरकार देख रही है, क्याउसे फलीभूत करने में हमारे निशानेबाज सक्षम हैं?यह सवाल इसलिए उठेगा क्योंकि निशानेबाजी में भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर अच्छा प्रदर्शन करता रहा है, लेकिन जापान में ज्यादातर खिलाड़ी ऑफकलर नजर आए।

चमकी महिला चौकड़ी
कमोबेश ऐसी ही स्थिति एथलेटिक्स में भी देखने को मिली। हालांकि कुल 24 पदकों सहित एथलेटिक्स दल ही भारत की ओर से सबसे ज्यादा पदक जीतने में सफल रहा। लेकिन महिलाओं की 4×400 मीटर रिले दौड़ में जीते गए एकमात्र स्वर्ण के अलावा एथलेटिक्स में इन खिलाड़ियों का प्रदर्शन दिखाता है कि भारत मुकाबले में तो है, लेकिन पदक के रंग को स्वर्ण में बदलने में अब भीपीछे हैं।एक ओर, विथ्या रामराज (महिला4×400 मी. रिले में स्वर्ण, मिश्रित4×400 मी.रिले में रजत और 400 मी. बाधा दौड़ में कांस्य) और भारतीय एथलेटिक जगत में तेजी से उभरे गुलवीर सिंह (10 हजार मी. व 1500 मी. दौड़ में रजत और 5 हजार मी. दौड़ में कांस्य) ने पदकों की हैट्रिक लगाकर आशा की किरणें जगायी हैं। लेकिन,तेजिंदरपाल सिंह तूरएशियाई खेलों की गोलाफेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी नहीं कर सके, जबकि लंबी कूद के मुरली श्रीशंकर और ऊंची कूद के सर्वेश कुशारे को भी रजत से संतोष करना पड़ा।हालांकि लगातार बारिश के कारण पदक के दावेदार ज्योति याराजी और अविनाश साबले को निराशा हाथ लगी। हांगझोउ में छह स्वर्ण जीतने वाले भारतीय एथलेटिक दल का इस बार का प्रदर्शन संतोषप्रद तो कहा जा सकता है, उत्साहवर्धक नहीं।

लंबा है सफर
कुल मिलाकर, भारत की खेल महत्वाकांक्षाओं को 2026 एशियाई खेलों में एक करारा झटका लगा, जहां पिछले हांगझोऊ खेलों में रिकॉर्ड प्रदर्शन के बाद एक और बड़ी छलांग की उम्मीद थी। वो हो न सका, अलबत्ता भारत ने पदक तालिका में अपना चौथा स्थान बरकरार रखा। भारत के खाते में इस बार 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदक ही रह गए। यह पिछले एशियाई खेलों में हासिल किए गए 106 पदकों से 7 स्वर्ण सहित कुल 21 पदक कम हैं। यही नहीं, शीर्ष पर कायम चीन (169 स्वर्ण सहित कुल 341 पदक), जापान (83 स्वर्ण सहित कुल 269 पदक) और दक्षिण कोरिया (39 स्वर्ण सहित 150 पदक) के पीछे भारत का चौथे स्थान पर रहना कुछ हद तक संतोषप्रद माना जा सकता है, लेकिन विश्व की शीर्षस्थ खेल महाशक्तियों की कतार में शामिल होना अब भी दूर की कौड़ी है। लंबा है सफर, लेकिन असंभव नहीं।

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