इंदौर के सारांश जैन को अब तक आईपीएल में नहीं मिला मौका, टेस्ट टीम में किया पदार्पण

ईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंदौर से एक बार फिर क्रिकेट के सर्वोच्च प्रारूप में युवा ने दस्तक दी है। इंदौर के सारांश जैन का भारतीय टेस्ट टीम में पदार्पण शहर के युवा क्रिकेटरों के लिए भी प्रेरणास्रोत है।

ऐसे समय में जब क्रिकेट का ककहरा सीखने वाले युवा आईपीएल की चकाचौंध और पैसों की वर्षा में घिरे नजर आते हैं, सारांश ने टेस्ट टीम के लिए अपनी उपयोगिता साबित की।

इंदौर के हरफनमौला सारांश जैन को श्रीलंका के खिलाफ दूसरे टेस्ट मैच के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया है। मध्य प्रदेश क्रिकेट संगठन के कई पुरुष खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला, लेकिन केवल चार खिलाड़ियों ने ही भारतीय टेस्ट टीम में पदार्पण किया। सारांश जैन से पहले राजेश चौहान (21 टेस्ट), नरेंद्र हिरवानी (17 टेस्ट), नमन ओझा (1 टेस्ट) और रजत पाटीदार (तीन टेस्ट) क्रिकेट के शीर्ष प्रारूप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

इनमें से राजेश चौहान के अलावा अन्य सभी इंदौर के ही हैं। इससे पहले मध्य प्रदेश से सीके नायडू (सात टेस्ट), सैयद मुश्ताक अली (11 टेस्ट), सीएस नायडू (11 टेस्ट), सीटी सरवटे (नौ टेस्ट), केएम रांगनेकर (तीन टेस्ट), एचजी गायकवाड़ (एक टेस्ट) भी टेस्ट क्रिकेट खेल चुके हैं। मध्य प्रदेश क्रिकेट संगठन के तहत निधि बुले, पूजा वस्त्रकार, वैष्णवी, अनुष्का और क्रांति गौड़ भी टेस्ट खेल चुकी हैं।

इससे पहले राजेश्वरी ढोलकिया, ज्योत्सना पटेल, संध्या अग्रवाल, रेखा पुणेकर, मिनोती देसाई, पुष्पांजलि शास्त्री, अरुंधति किरकिरे और बिंदेश्वरी गोयल भी टेस्ट क्रिकेट खेली हैं। पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर नरेंद्र हिरवानी ने उनके चयन पर खुशी जताते हुए कहा- जिस खिलाड़ी का चयन भारतीय टीम में हुआ है वह तो अच्छा होगा ही। इसमें कोई दोराय नहीं है।

टीम में चयन की जानकारी के बाद मैंने उसे समझाया था कि अब तक जो करते हो वही आगे भी करना। अंतर सिर्फ इतना है कि अब आप सिर्फ भारत के लिए खेलने जा रहे हो। अपने खेल पर ध्यान केंद्रीत रखना। मैच के दौरान अपने खेल के प्रति समर्पण महत्वपूर्ण होता है। मैंने उन्हें बताया कि खेल की तकनीक अपनी जगह है, लेकिन बड़े स्तर पर खेलते हुए मानसिक मजबूती महत्वपूर्ण होती है। यहां गलतियों की गुंजाइश कम हो जाती है।

यहां आपको अपनी तकनीक से आगे मानसिक मजबूती पर ध्यान देना होता है। बल्लेबाज का चेहरा देखकर गेंदबाजी मत करना। पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर अमय खुरासिया ने बताया कि सारांश के चयन का श्रेय उनकी मेहनत को, उनके समर्पण को और उनके हार न मानने के जज्बे को है। उन्होंने हर स्तर पर बहुत संघर्ष किया है, लेकिन कभी हार नहीं मानी। उन्हें एक ही बात का यकीन था कि वे अच्छा प्रदर्शन करेंगे तो टीम में जरूर आएंगे।

कई बार आप अच्छा काम करते हैं, लेकिन परिस्थितियों के चलते मन से टूट जाते हैं। मगर सारांश मन से नहीं टूटे। उन्होंने मेहनत जारी रखी। मुझे लगता है उन्हें आज से तीन-चार साल पहले ही भारतीय टीम में पदार्पण का मौका मिल जाना चाहिए था। वे गेंद और बल्ले दोनों से किसी भी टीम के लिए उपयोगी हैं। पर्याप्त अवसर मिलें तो वे बड़े खिलाड़ी बनेंगे।

पिता के सपने को पूरा किया

सारांश के पिता सुबोध जैन भी क्रिकेटर रहे हैं। उन्हीं की अंगुली पकड़कर सारांश पहली बार क्रिकेट मैदान पहुंचा था। पिता का सपना था देश के लिए खेलना, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। उन्होंने अपना सपना बेटे की सफलता में तलाशा। सारांश के पिता सुबोध कुमार जैन मुंह के कैंसर से जब जूझ रहे थे उस समय उनका चयन एमपीसीए के ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए हुआ था।

पिता ने बेटे के करियर की खातिर गंभीर बीमारी की बात उनसे छिपाई। वापस लौटकर जब सारांश को यह जानकारी मिली तो वह बहुत दुखी हुए। पिता ने समझाया कि वह जितना अच्छा क्रिकेट खेलेगा वह उतनी जल्दी ठीक हो जाएंगे। इससे सारांश बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित हुए। सारांश बीते 26 सालों से विभिन्न स्तर पर मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

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