India vs Pak Asian Games 2026 Rivalry: भारत और पाकिस्तान जब किसी खेल के मैदान पर आमने-सामने होते हैं तो स्कोरबोर्ड पर लिखे दो नाम अपने साथ इतिहास का बहुत बड़ा बोझ लेकर उतरते हैं।
विभाजन, युद्ध, सीमा तनाव और लगातार बदलते राजनीतिक संबंधों ने दोनों देशों के मुकाबलों को सामान्य खेल से कहीं अधिक भावनात्मक बना दिया है।
लेकिन एशियन गेम्स इस प्रतिद्वंद्विता का एक अलग और बेहद दिलचस्प दस्तावेज हैं। यहाँ कहानी केवल क्रिकेट की नहीं है। वास्तव में एशियाड में भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता क्रिकेट से कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी और उसका सबसे बड़ा मैदान हॉकी था। एक समय पाकिस्तान ने एशियाई हॉकी में ऐसा प्रभुत्व बनाया कि भारत लगातार फाइनल हारता रहा।
फिर भारत ने वापसी की और आधुनिक दौर में पाकिस्तान पीछे चला गया। कबड्डी में कहानी लगभग उलटी रही, भारत लंबे समय तक सबसे बड़ी शक्ति रहा और पाकिस्तान चुनौती देने वालों में। स्क्वैश में पाकिस्तान की विश्वविख्यात परंपरा थी। लेकिन नई सदी में भारत ने दूरी कम की और हांगझोऊ में पुरुष टीम फाइनल में पाकिस्तान को हराकर स्वर्ण जीता। क्रिकेट एशियाड में बहुत देर से आया।
फिर भी भारत-पाकिस्तान मुकाबला आते ही वह सबसे अधिक चर्चा वाले मुकाबलों में बदल गया। इन सभी खेलों को साथ रखकर देखें तो एशियाड वास्तव में दोनों देशों के बदलते खेल शक्ति-संतुलन का लगभग सात दशक लंबा आईना बन जाता है।
हॉकी से शुरू हुई असली एशियाड जंग, जब दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें थीं एशिया में आमने-सामने
आज भारत-पाकिस्तान खेल प्रतिद्वंद्विता सुनते ही क्रिकेट याद आता है।लेकिन 1950 से 1980 के दशक तक इस प्रतिद्वंद्विता का सबसे बड़ा मंच हॉकी था। उस समय भारत और पाकिस्तान केवल एशिया की श्रेष्ठ टीमें नहीं थे, वे दुनिया की श्रेष्ठ हॉकी शक्तियों में थे। भारत ने 1928 से 1956 तक लगातार छह ओलंपिक हॉकी स्वर्ण जीते थे। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने तेजी से अपनी अलग विश्वस्तरीय टीम बनाई और कुछ ही वर्षों में वह भारत के सामने खड़ा हो गया। एशियन गेम्स में पुरुष हॉकी 1958 टोक्यो में शामिल हुई।
पहले ही संस्करण में भारत-पाकिस्तान मुकाबले ने आने वाले दशकों की दिशा तय कर दी। दोनों टीमें अंक तालिका में बराबरी के करीब पहुँचीं। लेकिन गोल औसत के आधार पर पाकिस्तान ने स्वर्ण हासिल किया।
भारत रजत पर रहा। यह केवल एक पदक परिवर्तन नहीं था। जिस भारतीय हॉकी ने दशकों तक दुनिया पर शासन किया था, उसी से निकली दूसरी हॉकी परंपरा अब एशिया में उसे चुनौती देकर आगे निकल रही थी।
1962 जकार्ता, पाकिस्तान ने फाइनल में भारत को हराया, प्रतिद्वंद्विता हुई और गहरी
4 वर्ष बाद 1962 जकार्ता एशियाड में दोनों देश फिर निर्णायक मुकाबले में पहुँचे। इस बार व्यवस्था स्पष्ट थी-फाइनल में आमना-सामना और विजेता को स्वर्ण। पाकिस्तान ने भारत को 2-0 से हराकर लगातार दूसरा एशियाड हॉकी स्वर्ण जीत लिया। भारत फिर रजत पर रहा। यह वह समय था जब दोनों देशों की हॉकी दुनिया के शिखर पर थी। 1960 रोम ओलंपिक में पाकिस्तान ने भारत की लगातार छह ओलंपिक स्वर्ण की श्रृंखला समाप्त की थी और अब एशियाड में भी वही बढ़त दिखाई दे रही थी।
भारत के लिए पाकिस्तान केवल पड़ोसी प्रतिद्वंद्वी नहीं रह गया था, वह उस खेल में सबसे बड़ा अवरोध बन चुका था जिसे भारत अपनी राष्ट्रीय खेल पहचान का हिस्सा मानता था।
1966 बैंकॉक, भारत ने आखिर पाकिस्तान को एशियाड फाइनल में हराया
1958 में स्वर्ण पाकिस्तान गया।1962 में भी पाकिस्तान जीता। लेकिन 1966 बैंकॉक में भारत ने हिसाब बदला। फाइनल फिर भारत और पाकिस्तान के बीच था। मुकाबला बेहद कड़ा रहा। भारत ने अतिरिक्त समय में पाकिस्तान को 1-0 से हराकर पहली बार एशियन गेम्स पुरुष हॉकी स्वर्ण जीता। यह जीत इसलिए विशेष थी क्योंकि इससे केवल एशियाड खिताब नहीं मिला। पाकिस्तान के लगातार दो स्वर्ण का क्रम भी टूटा। उस दौर में भारत-पाकिस्तान हॉकी का अर्थ था दुनिया की दो लगभग बराबर ताकतों का मुकाबला।
मैच कई बार एक गोल, एक पेनल्टी कॉर्नर या कुछ मिनटों की श्रेष्ठता से तय होते थे। 1966 की जीत भारतीय हॉकी के लिए उसी स्तर की प्रतिष्ठा रखती थी जैसी बाद के वर्षों में बड़े क्रिकेट मुकाबलों की जीत ने हासिल की।
फिर भारत बार-बार पीछे रह गया
1966 के बाद शक्ति-संतुलन फिर पाकिस्तान की ओर झुक गया। 1970 बैंकॉक एशियाड में पाकिस्तान ने भारत को फाइनल में हराकर स्वर्ण वापस लिया। 1974 तेहरान में भी पाकिस्तान चैंपियन बना। 1978 बैंकॉक में पाकिस्तान ने फिर स्वर्ण जीता और 1982 दिल्ली में कहानी अपने सबसे नाटकीय मोड़ पर पहुँची। इन वर्षों में पाकिस्तान की हॉकी तेज, आक्रामक और तकनीकी रूप से बेहद मजबूत थी। उसके पास विश्व स्तर के फॉरवर्ड और ड्रिब्लर थे। वह ओलंपिक तथा विश्व कप में भी बड़ी शक्ति था।
भारत अब भी मजबूत था। लेकिन जिस खेल पर कभी उसका लगभग एकाधिकार था, उसमें पाकिस्तान कई बार अधिक आधुनिक और प्रभावी टीम दिखाई देने लगा।
दिल्ली 1982, भारतीय हॉकी की सबसे दर्दनाक एशियाड रातों में एक
1982 एशियन गेम्स भारत में हो रहे थे। दिल्ली का नया जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, रंगीन टेलीविजन का विस्तार, ‘अप्पू’ शुभंकर और पूरे देश की निगाहें आयोजन पर थीं। पुरुष हॉकी फाइनल में वही मुकाबला सामने आया जिसकी मेजबान देश को प्रतीक्षा थी-भारत बनाम पाकिस्तान। उम्मीद थी कि घरेलू मैदान पर भारत 1966 के बाद फिर एशियाड स्वर्ण जीतेगा। हुआ बिल्कुल उलटा।
पाकिस्तान ने भारत को 7-1 से हरा दिया। एशियाड हॉकी इतिहास में भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता का यह सबसे चौंकाने वाला परिणामों में एक है। घरेलू दर्शकों के सामने छह गोल के अंतर से फाइनल हारना भारतीय हॉकी के लिए गहरी चोट थी। पाकिस्तान के लिए यह उसके एशियाई प्रभुत्व का चरम था।
1958 से 1982 तक हुए सात पुरुष हॉकी एशियाड में पाकिस्तान ने छह स्वर्ण जीते, भारत केवल 1966 में उसे रोक पाया। उस समय यदि कोई केवल एशियाड परिणाम देखता तो भारत-पाकिस्तान हॉकी शक्ति-संतुलन स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के पक्ष में दिखाई देता।
लेकिन पाकिस्तान का हॉकी साम्राज्य भी होने लगा कमजोर
1980 के दशक के बाद अंतरराष्ट्रीय हॉकी बदलने लगी। कृत्रिम टर्फ ने खेल की गति, फिटनेस, पासिंग और रणनीति बदल दी। यूरोपीय देशों और ऑस्ट्रेलिया ने आधुनिक संरचनाओं में भारी निवेश किया। दक्षिण कोरिया एशिया में नई शक्ति बनकर उभरा। भारत और पाकिस्तान दोनों पुराने गौरव से नीचे आने लगे। लेकिन पाकिस्तान की गिरावट आगे चलकर अधिक गहरी हुई।
1990 और 2000 के दशकों में एशियाड हॉकी अब केवल भारत-पाकिस्तान की कहानी नहीं रही। दक्षिण कोरिया ने खिताब जीते। बाद में अन्य एशियाई टीमें मजबूत हुईं। भारत ने 1998 बैंकॉक में लंबे इंतजार के बाद स्वर्ण जीता। 2014 इंचियोन में फिर चैंपियन बना।2023 हांगझोऊ में स्वर्ण हासिल किया और 2026 में खिताब बचाया। पाकिस्तान, जिसने शुरुआती सात संस्करणों में छह स्वर्ण जीते थे।
आधुनिक दौर में उसी निरंतरता को बनाए नहीं रख सका। इस तरह हॉकी में एशियाड प्रतिद्वंद्विता का पूरा चक्र दिखाई देता है-पहले भारत की ऐतिहासिक विश्व प्रतिष्ठा। फिर पाकिस्तान का एशियाड प्रभुत्व। फिर दोनों का पतन और अंततः भारत की अपेक्षाकृत मजबूत वापसी।
हांगझोऊ में 10-2, वही प्रतिद्वंद्विता लेकिन बदला शक्ति-संतुलन
हॉकी के बदलते समीकरण का सबसे स्पष्ट आधुनिक उदाहरण हांगझोऊ एशियाड में आया, जब भारत ने पूल मुकाबले में पाकिस्तान को 10-2 से हरा दिया। यह परिणाम पुराने हॉकी इतिहास को जानने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए असाधारण था। जिस पाकिस्तान ने 1982 दिल्ली के फाइनल में भारत को 7-1 से हराया था, चार दशक बाद वही पाकिस्तान भारत के खिलाफ आठ गोल के अंतर से हार रहा था।
दोनों स्कोरों को साथ रखिए-1982 पाकिस्तान 7, भारत 1; हांगझोऊ भारत 10, पाकिस्तान 2। इन दो मैचों के बीच भारतीय और पाकिस्तानी हॉकी की बदलती दिशा का पूरा इतिहास दिखाई देता है।
भारत ने आधुनिक प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता, पेशेवर सहायता और संरचना में सुधार के सहारे फिर विश्व स्तर पर जगह बनाई, जबकि पाकिस्तान आर्थिक, प्रशासनिक और संरचनात्मक समस्याओं के बीच अपनी पुरानी निरंतरता खोता गया।
कबड्डी में थी कहानी बिल्कुल उलटी
यदि हॉकी के शुरुआती एशियाड इतिहास में पाकिस्तान भारत पर भारी था तो कबड्डी में स्थिति उलटी रही। पुरुष कबड्डी 1990 बीजिंग एशियन गेम्स में पदक खेल बनी और भारत ने शुरुआत से ही इसे लगभग अपनी जागीर बना लिया। भारत ने 1990 से लगातार कई संस्करणों में स्वर्ण जीते। पाकिस्तान मजबूत टीम रहा, उसने भारत को चुनौती दी और कई बार पदक जीते।
लेकिन भारतीय कबड्डी की गहराई, तकनीक और घरेलू परंपरा उसे लंबे समय तक आगे रखती रही। दोनों देशों के खिलाड़ियों की शैली भी मुकाबले को विशेष बनाती थी-पाकिस्तान की शारीरिक ताकत और आक्रामकता के सामने भारतीय रेडिंग कौशल, चेन डिफेंस और रणनीतिक गहराई।
यहाँ भारत वही भूमिका निभा रहा था, जो शुरुआती दशकों की हॉकी में पाकिस्तान निभाता था-हर प्रतिद्वंद्वी जानता था कि स्वर्ण जीतना है तो पहले भारत को हटाना होगा।
कबड्डी ने दिखाया कि पारंपरिक खेल में संस्थागत बढ़त
भारत और पाकिस्तान दोनों में कबड्डी की गहरी ग्रामीण परंपरा है।लेकिन अंतरराष्ट्रीय शैली की कबड्डी को संगठित करने, राष्ट्रीय शिविर, खिलाड़ियों का बड़ा चयन आधार और बाद में पेशेवर लीग जैसी व्यवस्थाएँ भारत में अधिक विकसित हुईं। इसका परिणाम एशियाड में दिखाई दिया। भारत लंबे समय तक पुरुष कबड्डी का निर्विवाद एशियाई चैंपियन रहा।
2018 जकार्ता में ईरान ने भारत को सेमीफाइनल में हराकर इस प्रभुत्व को तोड़ा और दिखाया कि तीसरी शक्ति अब दोनों दक्षिण एशियाई देशों से आगे निकल सकती है।
यह भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता की एक और महत्वपूर्ण सीख है-दो देश जब एक-दूसरे को सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानते रहते हैं तो कभी-कभी तीसरा देश दोनों से आगे निकल जाता है। हॉकी में दक्षिण कोरिया ने ऐसा किया। कबड्डी में ईरान ने।
हांगझोऊ का कबड्डी फाइनल, प्रतिद्वंद्विता का भूगोल बदला
हांगझोऊ 2023 में भारत पुरुष कबड्डी के फाइनल में पहुँचा। लेकिन सामने पाकिस्तान नहीं, ईरान था। विवादास्पद और लंबे समय तक रुके फाइनल में भारत ने स्वर्ण हासिल किया। यह दृश्य अपने आप में बताता था कि एशियाई कबड्डी का शक्ति-संतुलन बदल चुका है। पाकिस्तान अब भी महत्वपूर्ण टीम था। लेकिन भारत का सबसे बड़ा खिताबी प्रतिद्वंद्वी ईरान बन चुका था।
यानी जिस तरह हॉकी भारत-पाकिस्तान के द्वंद्व से निकलकर बहुध्रुवीय एशियाई खेल बना, कबड्डी भी उसी दिशा में गई।
क्रिकेट में भारत-पाकिस्तान कहानी अपेक्षाकृत छोटी
यह सुनकर आश्चर्य हो सकता है कि जिस खेल में भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता दुनिया की सबसे बड़ी खेल प्रतिद्वंद्विताओं में गिनी जाती है, उसी क्रिकेट की एशियाड कहानी बहुत छोटी है। क्रिकेट पहली बार 2010 ग्वांगझोऊ एशियन गेम्स में शामिल हुआ। 2014 इंचियोन में भी क्रिकेट रहा। लेकिन भारत ने इन दोनों संस्करणों में अपनी क्रिकेट टीमें नहीं भेजीं। इसलिए पाकिस्तान मौजूद था।
लेकिन वह भारत-पाकिस्तान मुकाबला नहीं बन पाया जिसकी दर्शक अपेक्षा करते। 2018 जकार्ता में क्रिकेट कार्यक्रम में नहीं था। हांगझोऊ 2023 में क्रिकेट वापस आया।इस बार भारत ने पुरुष और महिला दोनों टीमें भेजीं।
भारतीय महिलाओं ने स्वर्ण जीता। पुरुष टीम ने भी स्वर्ण हासिल किया। एशियाड में क्रिकेट के प्रवेश ने पहली बार यह संभावना मजबूत की कि भारत-पाकिस्तान की सबसे लोकप्रिय खेल प्रतिद्वंद्विता अब नियमित रूप से बहु-खेल आयोजन का हिस्सा बन सकती है।
2026 में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट
आइची-नागोया 2026 में क्रिकेट फिर कार्यक्रम का हिस्सा रहा।भारत-पाकिस्तान पुरुष मुकाबले ने स्वाभाविक रूप से भारी ध्यान खींचा। भारत ने पाकिस्तान को 19 रन से हराकर अपना खिताब बरकरार रखा। एशियाड के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण था, क्योंकि क्रिकेट में भारत-पाकिस्तान की वह प्रतिद्वंद्विता, जो विश्व कप और एशिया कप में विशाल दर्शक संख्या खींचती है, अब एशियन गेम्स की पदक कहानी का भी हिस्सा बन चुकी थी।
हॉकी में दोनों देशों की प्रतिद्वंद्विता एशियाड जितनी पुरानी है, जबकि क्रिकेट में यह लगभग नई है। यही अंतर दिलचस्प है-जो खेल आज दोनों देशों के रिश्ते का सबसे बड़ा खेल प्रतीक है, वह एशियाड इतिहास में सबसे नया अध्याय है।
स्क्वैश में पाकिस्तान की बादशाहियत के आगे खड़ी की चुनौती
भारत-पाकिस्तान खेल प्रतिद्वंद्विता की चर्चा केवल हॉकी, कबड्डी और क्रिकेट तक सीमित रखना भी अधूरा होगा। स्क्वैश में पाकिस्तान की विरासत विश्व खेल इतिहास की महानतम विरासतों में है। जहांगीर खान और जानशेर खान के दौर में पाकिस्तान ने दुनिया पर राज किया। हालांकि एशियन गेम्स में स्क्वैश 1998 में शामिल हुआ, तब तक पाकिस्तान का विश्व प्रभुत्व अपने चरम से नीचे आ चुका था।
भारत ने धीरे-धीरे स्क्वैश में अपनी व्यवस्था मजबूत की और सौरव घोषाल, दीपिका पल्लीकल, जोशना चिनप्पा तथा बाद की पीढ़ियों ने भारत को एशियाई शक्ति बनाया।
हांगझोऊ 2023 का पुरुष टीम स्क्वैश फाइनल भारत-पाकिस्तान एशियाड प्रतिद्वंद्विता के सबसे नाटकीय आधुनिक मुकाबलों में शामिल है। भारत और पाकिस्तान स्वर्ण के लिए आमने-सामने थे। मुकाबला निर्णायक तीसरे मैच तक गया। भारत के अभय सिंह और पाकिस्तान के नूर ज़मान के बीच अंतिम मैच ने खिताब तय किया। अभय ने अत्यंत दबाव वाली स्थिति से वापसी की।
भारत को 2-1 से टीम फाइनल जिताकर स्वर्ण दिलाया। पुराने खेल इतिहास में पाकिस्तान स्क्वैश का वह नाम था जिससे दुनिया डरती थी। लेकिन हांगझोऊ में भारत एशियाड स्वर्ण लेकर निकला। यह भी बदलते शक्ति-संतुलन का प्रतीक था।
भारत से अलग हो पाकिस्तान उसकी खेल परंपरा का हिस्सा लेकर गया
भारत-पाकिस्तान खेल प्रतिद्वंद्विता की गहराई समझने के लिए 1947 को याद रखना आवश्यक है। विभाजन केवल जमीन का नहीं था, संस्थाओं, खिलाड़ियों और खेल परंपराओं का भी था। अविभाजित भारत की हॉकी परंपरा के खिलाड़ी और प्रशिक्षक दोनों देशों में बँट गए। पंजाब दोनों ओर था। हॉकी दोनों ओर गहराई से लोकप्रिय थी। इसलिए पाकिस्तान ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद विश्वस्तरीय हॉकी टीम बना ली।
यही बात कुछ हद तक कुश्ती, कबड्डी और दूसरे पारंपरिक खेलों में भी लागू होती है। दोनों देशों की खेल संस्कृतियाँ कई जगह एक ही सामाजिक और भौगोलिक जड़ से निकली थीं। यही कारण है कि मुकाबला केवल दो देशों का नहीं, कई बार एक ही खेल परंपरा की दो शाखाओं का मुकाबला लगता था।
राजनीतिक तनाव ने मुकाबलों को बनाया बड़ा
भारत और पाकिस्तान ने 1947 के बाद कई युद्ध और गंभीर सैन्य संकट देखे। द्विपक्षीय खेल संबंध कई बार टूटे। क्रिकेट श्रृंखलाएँ बंद हुईं। टीमों के दौरों पर विवाद हुए। वीजा और सुरक्षा के प्रश्न उठे। लेकिन एशियन गेम्स जैसे बहुपक्षीय आयोजनों ने दोनों देशों के खिलाड़ियों को एक ही मंच पर बनाए रखा। यही एशियाड की विशेषता है। यहाँ मुकाबला द्विपक्षीय संबंधों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता।
यदि दोनों देश प्रतियोगिता में हैं। ड्रॉ उन्हें आमने-सामने लाता है तो वे खेलते हैं। इस तरह एशियाड कई बार वह मैदान बना जहाँ राजनीतिक संवाद सीमित होने के बावजूद खेल संपर्क जारी रहा।
भारत-पाकिस्तान मैच का दबाव दूसरे मुकाबले जैसा नहीं
खिलाड़ी अक्सर कहते रहे हैं कि वे हर मैच को समान मानते हैं। लेकिन दर्शक ऐसा नहीं मानते। भारत-पाकिस्तान मुकाबले में हार और जीत का सार्वजनिक अर्थ कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि 1982 की 7-1 हॉकी हार भारतीय स्मृति में सामान्य रजत पदक से कहीं अधिक दर्दनाक बनी रही। उसी तरह हांगझोऊ का 10-2 परिणाम पाकिस्तान के लिए सामान्य पूल हार नहीं था।
स्क्वैश का 2023 फाइनल केवल टीम स्वर्ण नहीं था, सामने पाकिस्तान होने के कारण उसका भावनात्मक महत्व बढ़ गया। क्रिकेट में यह प्रभाव और अधिक दिखाई देता है। खिलाड़ी मैदान पर केवल तकनीकी मुकाबला खेलता है। लेकिन स्टैंड, मीडिया और घरों में बैठे दर्शक उसमें इतिहास, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और राजनीतिक संबंधों का अर्थ जोड़ देते हैं।
1982 का 7-1 और हांगझोऊ का 10-2, दो स्कोर में छिपी कहानी
भारत-पाकिस्तान एशियाड प्रतिद्वंद्विता के बदलते स्वरूप को समझने के लिए शायद दो हॉकी स्कोर ही पर्याप्त हैं। दिल्ली 1982-पाकिस्तान 7, भारत 1। हांगझोऊ 2023-भारत 10, पाकिस्तान 2। पहले स्कोर के समय पाकिस्तान एशियाई हॉकी का राजा था। दूसरे के समय भारत फिर विश्व की मजबूत टीमों में था। पाकिस्तान अपने पुराने स्तर से काफी नीचे जा चुका था।
लेकिन इन दो परिणामों को यह कहने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए कि किसी एक देश की खेल क्षमता स्थायी रूप से दूसरे से बेहतर है। खेल शक्ति बदलती रहती है। पाकिस्तान ने कभी हॉकी और स्क्वैश में विश्व पर राज किया।
भारत कभी हॉकी में विश्व का बादशाह था। फिर नीचे गया और फिर कुछ हद तक लौटा। कबड्डी में भारत का एकाधिकार ईरान ने तोड़ा। यही खेल इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण नियम है-कोई साम्राज्य स्थायी नहीं होता।
कहाँ है आज शक्ति-संतुलन
आधुनिक एशियाड को देखें तो भारत का खेल आधार पाकिस्तान की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो चुका है। भारत एथलेटिक्स, निशानेबाजी, तीरंदाजी, बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी, कबड्डी, क्रिकेट, स्क्वैश और कई दूसरे खेलों में पदक जीतता है। पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय ताकत अपेक्षाकृत कम खेलों में केंद्रित रह गई है। यह अंतर दोनों देशों के एशियाड पदक प्रदर्शन में भी दिखाई देता है। लेकिन इस तुलना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू किसी देश को स्थायी विजेता घोषित करना नहीं।
बल्कि यह समझना है कि खेल संरचना, निवेश, घरेलू प्रतियोगिता, प्रशासन और खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाएँ समय के साथ राष्ट्रीय शक्ति बदल सकती हैं। हॉकी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है-जो पाकिस्तान कभी भारत को एशियाड फाइनल में 7-1 से हरा रहा था, वही चार दशक बाद 10-2 से हार गया।
भारत-पाक-हार- जीत सामान्य नहीं
यही इस प्रतिद्वंद्विता की स्थायी विशेषता है। खेल बदल गया।खिलाड़ी बदल गए। पीढ़ियाँ बदल गईं। दोनों देशों का एशियाड स्तर भी बदल गया। लेकिन मुकाबले का भावनात्मक भार बना रहा। 1966 में भारत ने पाकिस्तान को हराकर हॉकी स्वर्ण जीता तो उसका महत्व केवल पदक नहीं था। 1982 में पाकिस्तान की 7-1 जीत केवल स्वर्ण नहीं थी।
हांगझोऊ में भारत का 10-2 केवल तीन अंक वाला पूल मैच नहीं था। उसी एशियाड में स्क्वैश टीम फाइनल की अंतिम रैली केवल एक रैली नहीं थी। और क्रिकेट में दोनों देशों का सामना होते ही एशियाड का वह मैच उन दर्शकों तक भी पहुँच जाता है, जो सामान्यतः एशियन गेम्स का हर मुकाबला नहीं देखते।
भारत और पाकिस्तान की एशियाड प्रतिद्वंद्विता इसलिए किसी एक खेल की कहानी नहीं है। हॉकी इसका अतीत है।कबड्डी इसकी देसी जड़ है। स्क्वैश बदलते शक्ति-संतुलन का प्रमाण है। क्रिकेट इसका नया विशाल मंच है। कभी पाकिस्तान आगे था और भारत उसका पीछा कर रहा था। किसी दूसरे खेल में भारत आगे रहा और पाकिस्तान चुनौती देने वाला बना। फिर ईरान, दक्षिण कोरिया, जापान और दूसरे देशों ने दोनों को याद दिलाया कि एशिया केवल भारत और पाकिस्तान नहीं है।
करीब सात दशक की इस कहानी का सबसे रोचक निष्कर्ष शायद यही है कि भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता में स्थायी विजेता कोई नहीं रहा। लेकिन स्थायी आकर्षण जरूर रहा है। पीढ़ियाँ बदलती हैं। खेल बदलते हैं।
राष्ट्रीय ताकत बदलती है। लेकिन जैसे ही स्कोरबोर्ड पर IND बनाम PAK दिखाई देता है, एशियाड का एक सामान्य मुकाबला अचानक इतिहास से जुड़ जाता है। और शायद इसी कारण हॉकी के 1958 टोक्यो से लेकर आज के क्रिकेट, कबड्डी और स्क्वैश तक यह एशियन गेम्स की सबसे लंबी, सबसे भावनात्मक और लगातार रूप बदलती खेल प्रतिद्वंद्विताओं में से एक बनी हुई है।