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Sexuality Explained in Hindi: पुरुष स्त्री की ओर आकर्षित होता है, स्त्री पुरुष की ओर। इसे लंबे समय तक मानव यौन व्यवहार का सामान्य और लगभग एकमात्र रूप समझा जाता रहा। लेकिन मनुष्य की यौनिकता का वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि आकर्षण का संसार इससे कहीं अधिक विविध है।

कुछ पुरुष पुरुषों की ओर आकर्षित होते हैं, कुछ स्त्रियाँ स्त्रियों की ओर। कुछ लोगों को एक से अधिक लिंग के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण होता है, जबकि कुछ व्यक्तियों को किसी के प्रति यौन आकर्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता। कुछ लोगों के लिए सामने वाले व्यक्ति का लिंग आकर्षण का प्रमुख आधार होता है, तो कुछ के लिए उसका अपेक्षाकृत कम महत्त्व होता है। इन विभिन्न प्रवृत्तियों को समझने के लिए हेटेरोसेक्सुअल, होमोसेक्सुअल, बाइसेक्सुअल, पैनसेक्सुअल, मोनोसेक्सुअल और एसेक्सुअल जैसे शब्द विकसित हुए हैं। लेकिन यहीं सबसे बड़ी गलतफहमी पैदा होती है।

क्या ये सभी अलग-अलग बीमारियाँ या मनोवैज्ञानिक अवस्थाएँ हैं? क्या यौन रुझान और यौन व्यवहार एक ही बात हैं? क्या कोई विवाहित व्यक्ति समलैंगिक हो सकता है? क्या बाइसेक्सुअल व्यक्ति एक समय में दो लोगों से संबंध बनाना चाहता है? और क्या मोनोसेक्सुअल का अर्थ केवल एक व्यक्ति के साथ संबंध रखना है? आधुनिक मनोविज्ञान इन सवालों के उत्तर आकर्षण, पहचान और व्यवहार के बीच अंतर करके देता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि यौन रुझान मनुष्य की यौनिकता का एक पहलू है, न कि उसके पूरे व्यक्तित्व, चरित्र या नैतिकता की परिभाषा।

सबसे पहले समझिए, सेक्सुएलिटी और सेक्सुअल ओरिएंटेशन एक ही चीज नहीं हैं

अंग्रेज़ी शब्द ‘सेक्सुएलिटी’ का हिंदी अर्थ सामान्यतः ‘यौनिकता’ है। यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें मनुष्य की यौन भावनाएँ, आकर्षण, इच्छाएँ, यौन व्यवहार, अपने शरीर के प्रति अनुभव, अंतरंग संबंधों के प्रति दृष्टिकोण और यौन पहचान जैसे अनेक पहलू शामिल हो सकते हैं। इसके विपरीत ‘सेक्सुअल ओरिएंटेशन’ अर्थात ‘यौन रुझान’ अपेक्षाकृत विशिष्ट अवधारणा है। यह मुख्यतः इस प्रश्न से संबंधित है कि कोई व्यक्ति किस लिंग या किन लिंगों के व्यक्तियों के प्रति यौन, रोमांटिक अथवा भावनात्मक आकर्षण अनुभव करता है, या ऐसा आकर्षण नहीं करता। इसलिए सेक्सुएलिटी को केवल इस प्रश्न तक सीमित कर देना कि व्यक्ति पुरुष को पसंद करता है या स्त्री को, उचित नहीं है। किसी व्यक्ति का यौन रुझान उसकी व्यापक यौनिकता का केवल एक हिस्सा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन यौन रुझान को शारीरिक, रोमांटिक और भावनात्मक आकर्षण या ऐसे आकर्षण की अनुपस्थिति से संबंधित अवधारणा मानता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ भी इसे दूसरे व्यक्तियों के प्रति आकर्षण और उससे जुड़ी पहचान तथा संभावित व्यवहार के संदर्भ में समझाता है। इस परिभाषा की विशेषता है कि इसमें केवल यौन संबंध बनाना निर्णायक नहीं है। कोई व्यक्ति किसी की ओर आकर्षित हो सकता है, लेकिन उसके साथ कभी यौन संबंध न बनाए। इसी तरह किसी व्यक्ति का वास्तविक यौन व्यवहार उसकी आंतरिक पहचान से हमेशा मेल खाए, यह भी आवश्यक नहीं।

यौन रुझान को समझने के तीन आधार : आकर्षण, पहचान और व्यवहार

आधुनिक मनोविज्ञान में यौन रुझान का अध्ययन करते समय तीन अलग पहलुओं का उपयोग किया जाता है। पहला है ‘आकर्षण’-व्यक्ति किसकी ओर भावनात्मक, रोमांटिक या यौन रूप से आकर्षित होता है। दूसरा है ‘पहचान’-वह स्वयं को हेटेरोसेक्सुअल, गे, लेस्बियन, बाइसेक्सुअल या किसी अन्य पहचान से संबोधित करता है या नहीं। तीसरा है ‘व्यवहार’-उसने वास्तविक जीवन में किन व्यक्तियों के साथ यौन संबंध बनाए हैं। ये तीनों पहलू किसी व्यक्ति में एक-दूसरे से संबंधित हो सकते हैं, लेकिन पूरी तरह एक जैसे होना अनिवार्य नहीं है। अमेरिका की एसोसिएशन फॉर बिहेवियरल एंड कॉग्निटिव थेरेपीज़ तथा नेशनल एकेडमीज़ की प्रकाशित सामग्री इन तीनों के बीच स्पष्ट अंतर करती है।

उदाहरण के लिए कोई पुरुष विवाह करके अपनी पत्नी के साथ जीवन बिता रहा हो, लेकिन वह भीतर से मुख्यतः पुरुषों की ओर आकर्षण अनुभव करता हो। उसका वैवाहिक व्यवहार और उसका वास्तविक आकर्षण एक जैसा नहीं है। इसी प्रकार कोई महिला पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रति आकर्षण अनुभव करती हो, लेकिन जीवन में उसने केवल पुरुष के साथ संबंध बनाया हो। केवल उसके संबंधों का इतिहास देखकर उसे निश्चित रूप से हेटेरोसेक्सुअल घोषित नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत किसी व्यक्ति ने किसी परिस्थिति में समान लिंग के व्यक्ति के साथ यौन व्यवहार किया हो, तो केवल उसी एक अनुभव के आधार पर उसकी स्थायी यौन पहचान तय करना भी उचित नहीं है। इसलिए यौन रुझान की वैज्ञानिक समझ में व्यक्ति के अपने अनुभव और आत्मपहचान का विशेष महत्त्व है।

हेटेरोसेक्सुअल क्या होता है?

‘हेटेरोसेक्सुअल’ शब्द में ‘हेटेरो’ का अर्थ अलग या भिन्न है। इसका उपयोग सामान्यतः ऐसे व्यक्ति के लिए होता है जो अपने से अलग लिंग के व्यक्तियों की ओर मुख्यतः यौन या रोमांटिक आकर्षण अनुभव करता है। उदाहरण के लिए किसी पुरुष का स्त्रियों की ओर आकर्षित होना या किसी स्त्री का पुरुषों की ओर आकर्षित होना हेटेरोसेक्सुअल रुझान का सबसे परिचित रूप है। अंग्रेज़ी की सामान्य बोलचाल में ऐसे व्यक्तियों के लिए ‘स्ट्रेट’ शब्द भी इस्तेमाल किया जाता है। विश्व की अनेक सामाजिक व्यवस्थाओं में लंबे समय से पुरुष-स्त्री आकर्षण और विवाह को प्रमुख मान्यता प्राप्त रही है, इसलिए हेटेरोसेक्सुअल रुझान को अक्सर अलग नाम देने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह भी यौन रुझान की एक श्रेणी है, न कि सभी व्यक्तियों के लिए अनिवार्य नियम।

यहाँ एक सूक्ष्म अंतर है। हेटेरोसेक्सुअल होने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हर विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति आकर्षित होगा। जैसे किसी पुरुष को संसार की हर स्त्री आकर्षक नहीं लगती, वैसे ही किसी महिला को हर पुरुष के प्रति आकर्षण नहीं होता। यौन रुझान केवल आकर्षण की व्यापक दिशा बताता है। किन व्यक्तियों से वास्तविक आकर्षण पैदा होगा, यह व्यक्तिगत पसंद, भावनात्मक अनुभव, पारस्परिक संबंध और अनेक दूसरी परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। इसी प्रकार हेटेरोसेक्सुअल व्यक्ति अविवाहित हो सकता है, यौन संबंधों से दूर रह सकता है या जीवन में किसी भी समय संबंध न बनाने का निर्णय ले सकता है। उसकी यौन पहचान केवल उसके व्यवहार या वैवाहिक स्थिति से निर्धारित नहीं होती।

होमोसेक्सुअल क्या होता है और गे तथा लेस्बियन में क्या अंतर है?

‘होमोसेक्सुअल’ में ‘होमो’ का अर्थ समान है। इसका उपयोग सामान्यतः ऐसे व्यक्ति के लिए होता है जो अपने समान लिंग के लोगों की ओर मुख्यतः यौन अथवा रोमांटिक आकर्षण अनुभव करता है। पुरुष का पुरुष की ओर आकर्षित होना और स्त्री का स्त्री की ओर आकर्षित होना इसके सबसे परिचित उदाहरण हैं। पुरुषों के संदर्भ में ‘गे’ शब्द अधिक प्रचलित है, जबकि महिलाओं के संदर्भ में ‘लेस्बियन’ शब्द उपयोग किया जाता है। कुछ लोग ‘गे’ शब्द का व्यापक अर्थ में भी प्रयोग करते हैं। आधुनिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक संस्थाएँ प्रायः गे, लेस्बियन या समलैंगिक जैसे पहचान-सूचक शब्दों का प्रयोग करती हैं, क्योंकि ‘होमोसेक्सुअल’ का अतीत चिकित्सकीय वर्गीकरण से भी जुड़ा रहा है और कुछ संदर्भों में वह पुराना या असहज शब्द माना जा सकता है।

यहाँ विशेष रूप से समझना चाहिए कि समलैंगिक आकर्षण और किसी व्यक्ति की बाहरी वेशभूषा, आवाज़, चाल-ढाल या व्यक्तित्व के बीच कोई अनिवार्य संबंध नहीं है। कोई समलैंगिक पुरुष पूरी तरह पारंपरिक पुरुषोचित दिखाई देने वाले व्यवहार और रुचियाँ रख सकता है। किसी महिला की खेलों, कपड़ों या पेशे से संबंधित पसंद देखकर उसका यौन रुझान निश्चित नहीं किया जा सकता। यह भी सही नहीं कि समलैंगिक व्यक्ति अनिवार्य रूप से विपरीत लिंग के लोगों से घृणा करते हैं। आकर्षण की दिशा और सामाजिक संबंध अलग बातें हैं। समलैंगिक व्यक्ति अपने परिवार, मित्रों और समाज के अन्य सदस्यों के साथ उतने ही विविध प्रकार के भावनात्मक संबंध रख सकते हैं जितने अन्य लोग।

बाइसेक्सुअल यानी उभयलैंगिक क्या होता है?

‘बाइसेक्सुअल’ शब्द को पहले सामान्यतः ऐसे व्यक्ति के लिए समझाया जाता था जो पुरुषों और महिलाओं दोनों की ओर आकर्षित होता है। आधुनिक परिभाषाओं में इसका अर्थ अधिक व्यापक रूप से एक से अधिक लिंग के व्यक्तियों के प्रति यौन या रोमांटिक आकर्षण अनुभव करना है। उदाहरण के लिए कोई महिला स्त्रियों और पुरुषों दोनों के प्रति आकर्षण अनुभव कर सकती है। कोई पुरुष अपने समान लिंग और दूसरे लिंग के व्यक्तियों की ओर आकर्षित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं को बाइसेक्सुअल कह सकते हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ की परिभाषा के अनुसार बाइसेक्सुअल रुझान में एक से अधिक लिंग के व्यक्तियों की ओर आकर्षण शामिल हो सकता है।

लेकिन बाइसेक्सुअल होने से जुड़ी तीन बड़ी गलतफहमियाँ हैं। पहली यह कि ऐसे व्यक्ति को पुरुषों और महिलाओं के प्रति बिल्कुल बराबर आकर्षण होना चाहिए। ऐसा आवश्यक नहीं है। दूसरी यह कि उसे जीवन में दोनों लिंगों के व्यक्तियों के साथ यौन संबंध बनाकर अपनी पहचान साबित करनी होगी। यह भी गलत है। तीसरी यह कि बाइसेक्सुअल व्यक्ति एक साथ दो या अधिक लोगों से संबंध बनाना चाहता है। यौन रुझान और एक समय में संबंधों की संख्या दो अलग विषय हैं। कोई बाइसेक्सुअल व्यक्ति केवल एक साथी के साथ दीर्घकालिक, प्रतिबद्ध संबंध में रह सकता है। कोई व्यक्ति एक पुरुष के साथ विवाह में हो और फिर भी बाइसेक्सुअल हो सकता है। यौन पहचान केवल वर्तमान साथी के लिंग से समाप्त या परिवर्तित नहीं हो जाती।

मोनोसेक्सुअल क्या होता है? क्या इसका मतलब एक ही व्यक्ति से यौन संबंध रखना है?

यह इस विषय की सबसे महत्त्वपूर्ण शब्दावली संबंधी गलतफहमी है।’मोनोसेक्सुअल’ का अर्थ केवल एक लिंग के व्यक्तियों के प्रति यौन या रोमांटिक आकर्षण अनुभव करना है। इसका अर्थ एक ही व्यक्ति के साथ यौन संबंध रखना नहीं है। उदाहरण के लिए कोई पुरुष केवल महिलाओं की ओर आकर्षित होता है, तो उसे व्यापक वर्गीकरण में मोनोसेक्सुअल कहा जा सकता है। इसी तरह कोई महिला केवल महिलाओं की ओर आकर्षित होती है, तो वह भी मोनोसेक्सुअल आकर्षण की श्रेणी में आ सकती है। इस प्रकार हेटेरोसेक्सुअल और होमोसेक्सुअल दोनों सामान्यतः मोनोसेक्सुअल रुझान के उदाहरण हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय डेविस और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय सांता बारबरा की शब्दावलियों में इस शब्द का यही अर्थ दिया गया है।

यहाँ ‘मोनोसेक्सुअल’ और ‘मोनोगैमी’ के बीच अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है। मोनोगैमी का अर्थ है एक समय में एक अंतरंग या वैवाहिक साथी के साथ प्रतिबद्ध संबंध रखना। कोई व्यक्ति हेटेरोसेक्सुअल होते हुए मोनोगैमस हो सकता है। कोई समलैंगिक व्यक्ति भी एक साथी के साथ प्रतिबद्ध संबंध में रह सकता है। इसी तरह बाइसेक्सुअल व्यक्ति भी मोनोगैमस हो सकता है। इसलिए मोनोसेक्सुअल आकर्षण की दिशा का वर्णन करता है, जबकि मोनोगैमी संबंधों की संरचना का। इन दोनों शब्दों का अर्थ एक जैसा मानने से यौन रुझान और व्यक्तिगत व्यवहार को लेकर अनावश्यक भ्रम पैदा होता है।

नॉन-मोनोसेक्सुअल और मल्टीसेक्सुअल का क्या अर्थ है?

जब कोई व्यक्ति एक से अधिक लिंग के लोगों की ओर आकर्षण अनुभव करता है, तो उसके लिए व्यापक वर्गीकरण में ‘नॉन-मोनोसेक्सुअल’ या ‘मल्टीसेक्सुअल’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इस समूह में बाइसेक्सुअल, पैनसेक्सुअल, ओम्नीसेक्सुअल और कुछ दूसरे रुझान शामिल किए जाते हैं। लेकिन ये सभी शब्द एक-दूसरे के पूर्ण पर्याय नहीं हैं। कुछ व्यक्ति अपने आकर्षण की प्रकृति व्यक्त करने के लिए बाइसेक्सुअल शब्द पसंद करते हैं, जबकि दूसरे पैनसेक्सुअल या किसी अन्य पहचान का उपयोग करते हैं। नॉन-मोनोसेक्सुअल को कोई अलग बीमारी, अस्थिर मानसिक अवस्था या भ्रम नहीं माना जाता। यह कई प्रकार के आकर्षणों को समझने की एक व्यापक श्रेणी है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ तथा अन्य विश्वविद्यालयों की यौनिकता संबंधी शब्दावली इसी प्रकार के व्यापक वर्गीकरण को मान्यता देती है।

यह समझना भी आवश्यक है कि मल्टीसेक्सुअल व्यक्ति को एक ही समय में सभी लिंगों के प्रति आकर्षण होना आवश्यक नहीं है। उसके आकर्षण की तीव्रता विभिन्न लोगों के प्रति अलग हो सकती है। कोई व्यक्ति अपने जीवन में एक विशेष लिंग के लोगों के प्रति अधिक आकर्षण अनुभव कर सकता है, लेकिन दूसरे लिंग के व्यक्तियों की ओर भी आकर्षित हो सकता है। ऐसे अनुभव को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसके वर्तमान संबंध या पिछले व्यवहार में केवल एक लिंग के व्यक्ति शामिल रहे हैं। यौन रुझान की श्रेणियाँ मानव अनुभव को समझाने के साधन हैं; वे ऐसे कठोर नियम नहीं हैं जिनमें हर व्यक्ति का जीवन एक ही साँचे में पूरी तरह समा जाए।

पैनसेक्सुअल क्या होता है और यह बाइसेक्सुअल से कैसे अलग है?

‘पैनसेक्सुअल’ शब्द में ‘पैन’ का अर्थ सभी या व्यापक रूप से होता है। इस पहचान का उपयोग सामान्यतः ऐसे व्यक्ति करते हैं जो दूसरे लोगों की ओर उनके लिंग से स्वतंत्र रूप से आकर्षण अनुभव कर सकते हैं। उनके लिए आकर्षण का प्रमुख आधार सामने वाले व्यक्ति की व्यक्तिगत विशेषताएँ, व्यक्तित्व, भावनात्मक संबंध या दूसरे गुण हो सकते हैं और उसका पुरुष, स्त्री या किसी अन्य लिंग पहचान वाला होना निर्णायक बाधा नहीं होता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पैनसेक्सुअल व्यक्ति दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति की ओर आकर्षित होता है। वास्तविक आकर्षण हमेशा व्यक्ति-विशेष से संबंधित होता है।

बाइसेक्सुअल और पैनसेक्सुअल के बीच एक कठोर सार्वभौमिक सीमा निर्धारित करना कठिन है। आधुनिक बाइसेक्सुअल परिभाषा में भी एक से अधिक लिंग के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण शामिल है और उसमें ट्रांसजेंडर या नॉन-बाइनरी व्यक्तियों के प्रति आकर्षण को बाहर नहीं रखा जाता। पैनसेक्सुअल पहचान में व्यक्ति अक्सर इस बात पर विशेष जोर देता है कि उसके आकर्षण में दूसरे व्यक्ति का लिंग निर्णायक भूमिका नहीं निभाता। इन पहचानों में पर्याप्त समानता हो सकती है और कुछ व्यक्ति दोनों शब्दों का उपयोग भी करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति की अपनी पहचान को समझना शब्दकोश की कठोर सीमा थोपने से अधिक उपयोगी है।

ओम्नीसेक्सुअल और पॉलीसेक्सुअल क्या हैं?

यौन रुझान की विस्तृत शब्दावली में ‘ओम्नीसेक्सुअल’ और ‘पॉलीसेक्सुअल’ जैसे शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। ओम्नीसेक्सुअल पहचान सामान्यतः ऐसे आकर्षण के लिए इस्तेमाल की जाती है जो सभी लिंगों के व्यक्तियों के प्रति संभव हो, लेकिन जिसमें सामने वाले व्यक्ति के लिंग को आकर्षण के अनुभव का एक पहचाना जाने वाला हिस्सा माना जा सकता है। इसके विपरीत पैनसेक्सुअल पहचान में अक्सर यह कहा जाता है कि आकर्षण के लिए लिंग स्वयं निर्णायक नहीं है। ‘पॉलीसेक्सुअल’ आम तौर पर अनेक लिंगों के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण दर्शाता है, लेकिन आवश्यक नहीं कि उसमें सभी लिंग शामिल हों। इन शब्दों की परिभाषाएँ अलग-अलग समुदायों और व्यक्तियों के बीच कुछ बदल सकती हैं। इसलिए इन्हें ऐसे गणितीय वर्गों की तरह नहीं देखना चाहिए जिनकी सीमाएँ हर परिस्थिति में निश्चित हों।

यहाँ ‘पॉलीसेक्सुअल’ और ‘पॉलीएमरी’ के बीच अंतर भी समझना चाहिए। पॉलीसेक्सुअल आकर्षण की दिशा से संबंधित शब्द है, जबकि पॉलीएमरी एक से अधिक व्यक्तियों के साथ उनकी जानकारी और सहमति से अंतरंग संबंध रखने की संरचना से संबंधित है। इसी तरह मोनोगैमी एक साथी के साथ संबंध की व्यवस्था है। कोई व्यक्ति बाइसेक्सुअल या पैनसेक्सुअल होकर भी पूरी तरह मोनोगैमस हो सकता है। इसलिए कौन किसकी ओर आकर्षित होता है और कौन कितने व्यक्तियों के साथ संबंध रखता है, ये दो स्वतंत्र प्रश्न हैं।

एसेक्सुअल क्या होता है? क्या किसी के प्रति यौन आकर्षण न होना भी एक रुझान है?

हाँ। ‘एसेक्सुअल’ अथवा ‘अलैंगिक’ पहचान सामान्यतः ऐसे व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल होती है जो किसी के प्रति यौन आकर्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं अनुभव करते। इसका अर्थ यह नहीं कि उनमें भावनाएँ नहीं होतीं या वे किसी से प्रेम नहीं कर सकते। कोई एसेक्सुअल व्यक्ति गहरा रोमांटिक संबंध चाहता हो सकता है, किसी के साथ जीवन बिताने की इच्छा रख सकता है या भावनात्मक निकटता को बहुत महत्त्व दे सकता है। दूसरी ओर कोई एसेक्सुअल व्यक्ति रोमांटिक संबंध में भी रुचि न रखे। दोनों अनुभव संभव हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ एसेक्सुअलिटी को यौन रुझान की एक मान्य श्रेणी के रूप में स्वीकार करता है।

एसेक्सुअलिटी और शारीरिक यौन इच्छा अर्थात ‘लिबिडो’ के बीच भी अंतर है। यौन आकर्षण किसी दूसरे व्यक्ति की ओर केंद्रित अनुभव है, जबकि लिबिडो व्यापक शारीरिक यौन इच्छा या उत्तेजना से संबंधित हो सकती है। किसी व्यक्ति में शारीरिक उत्तेजना की क्षमता मौजूद हो, लेकिन वह किसी विशेष व्यक्ति के प्रति यौन आकर्षण न अनुभव करे, ऐसा संभव है। इसी तरह एसेक्सुअल व्यक्ति का कभी यौन व्यवहार करना उसकी पहचान को स्वतः गलत नहीं बनाता। ब्रह्मचर्य और एसेक्सुअलिटी भी अलग बातें हैं। ब्रह्मचर्य सामान्यतः व्यक्ति का आचरण संबंधी निर्णय है, जबकि एसेक्सुअलिटी आकर्षण के अनुभव से संबंधित है। कोई व्यक्ति यौन आकर्षण अनुभव करते हुए भी ब्रह्मचर्य अपना सकता है।

ग्रेसेक्सुअल और डेमीसेक्सुअल क्या होते हैं?

कुछ व्यक्ति यौन आकर्षण बहुत कम, बहुत दुर्लभ या विशेष परिस्थितियों में अनुभव करते हैं। ऐसे अनुभवों को समझाने के लिए ‘ग्रेसेक्सुअल’ या ‘ग्रे-एसेक्सुअल’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है। यह पहचान सामान्यतः एसेक्सुअलिटी और अपेक्षाकृत नियमित यौन आकर्षण के बीच के व्यापक अनुभवों को दर्शाती है। इसी तरह ‘डेमीसेक्सुअल’ शब्द ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग होता है जो सामान्यतः किसी के प्रति यौन आकर्षण तब तक अनुभव नहीं करता जब तक उसके साथ पर्याप्त गहरा भावनात्मक संबंध विकसित न हो जाए। लेकिन इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि व्यक्ति यौन संबंध बनाने से पहले प्रेम या विश्वास चाहता है। अनेक लोग किसी के प्रति आकर्षण पहले अनुभव करते हैं, लेकिन अपनी मान्यताओं के कारण संबंध में आगे बढ़ने का निर्णय बाद में लेते हैं। डेमीसेक्सुअलिटी में स्वयं आकर्षण के उभरने की प्रकृति अलग बताई जाती है।

इन सभी श्रेणियों को समझते समय एक सावधानी आवश्यक है। मानव आकर्षण का अनुभव बहुत व्यक्तिगत है और हर व्यक्ति को अपनी पहचान के लिए कोई विशिष्ट शब्द अपनाना जरूरी नहीं है। कोई व्यक्ति इन परिभाषाओं में स्वयं को पहचान सकता है, जबकि दूसरा अपने अनुभव को किसी तय श्रेणी में रखना पसंद न करे। इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अनुभव अवैज्ञानिक या अमान्य है। वैज्ञानिक अध्ययन के लिए श्रेणियाँ उपयोगी हैं, लेकिन वे मानवीय अनुभव की संपूर्ण विविधता का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं।

यौन रुझान के कुल कितने प्रकार होते हैं? क्या विज्ञान ने कोई निश्चित संख्या तय की है?

इस प्रश्न का एक महत्त्वपूर्ण उत्तर यह है कि यौन रुझानों की कोई एक अंतिम और सर्वमान्य संख्या निर्धारित नहीं है। परंपरागत मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में मुख्यतः हेटेरोसेक्सुअल, होमोसेक्सुअल और बाइसेक्सुअल जैसी तीन प्रमुख श्रेणियों का अधिक प्रयोग होता था। आधुनिक अध्ययनों और स्वास्थ्य संबंधी दिशानिर्देशों में एसेक्सुअल, पैनसेक्सुअल और दूसरे अनुभवों के लिए भी अलग शब्दों का उपयोग किया जाने लगा है। लेकिन इन शब्दों की संख्या बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि मानव शरीर में प्रत्येक पहचान के लिए कोई अलग जैविक तंत्र या निश्चित श्रेणी खोज ली गई है। कुछ नाम अलग-अलग प्रकार के आकर्षण को समझाने के लिए उपयोगी हैं, जबकि कुछ व्यापक श्रेणियाँ हैं जिनके भीतर अनेक पहचानें आ सकती हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ के शब्दकोश में भी यौन रुझान के अनेक उदाहरण दर्ज हैं, किसी अंतिम संख्या का दावा नहीं किया गया है।

इस संदर्भ में चार प्रमुख प्रश्नों से यौन रुझानों को समझना अधिक सुविधाजनक है। व्यक्ति अपने से अलग लिंग की ओर आकर्षित होता है, समान लिंग की ओर आकर्षित होता है, एक से अधिक लिंगों की ओर आकर्षित होता है या बहुत कम अथवा किसी भी व्यक्ति के प्रति यौन आकर्षण अनुभव नहीं करता। लेकिन ये भी व्यापक समझ के लिए बनाए गए प्रश्न हैं। कुछ अनुभव इनके बीच आते हैं और कुछ लोग अपने आकर्षण को और अधिक विशिष्ट शब्दों में व्यक्त करना पसंद करते हैं। इसलिए किसी लेख में यह लिख देना कि संसार में निश्चित रूप से केवल चार, सात या बारह यौन रुझान होते हैं, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।

क्या मनुष्य का यौन रुझान जन्म से तय होता है या बाद में विकसित होता है?

यौन रुझान की उत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिक अनुसंधान लंबे समय से चल रहा है। उपलब्ध शोध संकेत देता है कि मानव आकर्षण के विकास में जैविक, विकासात्मक और अन्य जटिल कारक शामिल हो सकते हैं। लेकिन अभी किसी एक जीन, एक हार्मोन या बचपन की किसी एक घटना के आधार पर व्यक्ति का यौन रुझान निश्चित रूप से बताने का वैज्ञानिक तरीका उपलब्ध नहीं है। इस विषय में सरल दावे-जैसे किसी विशेष पालन-पोषण से व्यक्ति समलैंगिक बन जाता है, या किसी एक अनुभव से उसका पूरा रुझान बदल जाता है-स्थापित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं हैं। शोध यह भी दिखाता है कि किसी व्यक्ति की आत्मपहचान, आकर्षण और व्यवहार को हमेशा एक जैसा नहीं माना जा सकता।

यहाँ ‘सेक्सुअल फ्लुइडिटी’ अर्थात यौन आकर्षण में प्रवाहशीलता की अवधारणा महत्त्वपूर्ण है। कुछ व्यक्तियों में समय के साथ आकर्षण के अनुभव या अपनी पहचान की समझ में परिवर्तन हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति का यौन रुझान लगातार बदलता रहता है या उसे बाहरी दबाव से इच्छानुसार बदला जा सकता है। अनेक व्यक्तियों में आकर्षण की दिशा लंबे समय तक स्थिर रहती है। दूसरों में अपने अनुभव को समझने और उसका नाम तय करने की प्रक्रिया अधिक जटिल हो सकती है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति युवावस्था में स्वयं को हेटेरोसेक्सुअल मानता रहा हो और बाद में महसूस करे कि उसे एक से अधिक लिंगों के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण होता है। इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि उसका आकर्षण उसी समय पहली बार पैदा हुआ हो। संभव है कि उसके अनुभव की आत्मसमझ समय के साथ स्पष्ट हुई हो।

क्या समलैंगिकता या उभयलैंगिकता कोई मानसिक बीमारी है?

नहीं। समलैंगिकता और उभयलैंगिकता को आधुनिक मनोचिकित्सा और मनोविज्ञान में स्वयं मानसिक बीमारी नहीं माना जाता। अमेरिकी मनोचिकित्सक संघ ने 1973 में समलैंगिकता को मानसिक विकारों की अपनी प्रमुख निदान सूची से हटाने का निर्णय लिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन की बीमारी वर्गीकरण प्रणाली में भी 1990 में समलैंगिकता को मानसिक रोग की श्रेणी से हटाया गया। आज प्रमुख अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक संस्थाएँ यौन रुझानों की विविधता को मानव अनुभव का हिस्सा मानती हैं। इस प्रकार किसी व्यक्ति का समान लिंग या एक से अधिक लिंग के व्यक्तियों की ओर आकर्षित होना अपने आप किसी मानसिक रोग, नैतिक कमी या उपचार योग्य विकार का प्रमाण नहीं है।

इस विषय में एक गंभीर समस्या तथाकथित ‘कन्वर्जन थेरेपी’ है, जिसमें किसी व्यक्ति का यौन रुझान उसकी इच्छा या पहचान के विरुद्ध बदलने का दावा किया जाता है। प्रमुख पेशेवर मनोवैज्ञानिक संस्थाएँ ऐसे प्रयासों के प्रभावी होने का विश्वसनीय प्रमाण नहीं पातीं और उनसे संभावित मानसिक नुकसान की चेतावनी देती हैं। किसी व्यक्ति को अपनी भावनाएँ समझने में सहायता देना, संबंधों से जुड़ी परेशानी पर परामर्श देना और उसके रुझान को जबरन बदलने की कोशिश करना अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं। चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक सहायता का उद्देश्य व्यक्ति की भलाई, आत्मसमझ और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को बढ़ाना होना चाहिए, न कि किसी एक विशेष यौन पहचान को उसके लिए अनिवार्य बनाना।

क्या ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स भी यौन रुझान के प्रकार हैं?

नहीं। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंतर है। ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द व्यक्ति की लैंगिक पहचान से संबंधित है, जबकि ‘इंटरसेक्स’ शब्द जन्मजात जैविक लैंगिक विशेषताओं की विविधता से संबंधित है। ये दोनों अपने आप यह नहीं बताते कि व्यक्ति किसकी ओर आकर्षित होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन स्पष्ट करता है कि यौन रुझान और लैंगिक पहचान अलग अवधारणाएँ हैं। व्यक्ति की लैंगिक पहचान इस प्रश्न से संबंधित है कि वह स्वयं को किस लिंग का मानता या अनुभव करता है। यौन रुझान इस प्रश्न से संबंधित है कि वह किसकी ओर आकर्षित होता है।

उदाहरण के लिए कोई ट्रांसजेंडर महिला पुरुषों की ओर आकर्षित हो सकती है, महिलाओं की ओर आकर्षित हो सकती है, एक से अधिक लिंगों के व्यक्तियों की ओर आकर्षित हो सकती है या एसेक्सुअल हो सकती है। इसी तरह कोई इंटरसेक्स व्यक्ति भी किसी भी यौन रुझान का हो सकता है। केवल शारीरिक विशेषताओं या लैंगिक पहचान के आधार पर उसका यौन आकर्षण तय नहीं किया जा सकता। ‘गे’, ‘बाइसेक्सुअल’, ‘ट्रांसजेंडर’ और ‘इंटरसेक्स’ को एक ही तरह की यौन पसंद मान लेना वैज्ञानिक रूप से गलत है। यह अंतर समझने से मानव शरीर, लैंगिक पहचान और यौन आकर्षण के बारे में बहुत-सी गलतफहमियाँ दूर हो सकती हैं।

क्या प्रेम, रोमांटिक आकर्षण और यौन आकर्षण अलग-अलग हो सकते हैं?

हाँ। मनुष्य किसी व्यक्ति के प्रति भावनात्मक निकटता, प्रेम या रोमांटिक आकर्षण अनुभव कर सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उसी तीव्रता से उसके प्रति यौन आकर्षण भी हो। कुछ व्यक्तियों में रोमांटिक और यौन आकर्षण की दिशाएँ लगभग समान होती हैं, जबकि दूसरे लोगों में उनका अनुभव अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए कोई एसेक्सुअल व्यक्ति किसी से प्रेम करता हो, उसके साथ दीर्घकालिक संबंध बनाना चाहता हो, लेकिन यौन आकर्षण बहुत कम अनुभव करता हो। इसी तरह कुछ लोग स्वयं को ‘एरोमांटिक’ बताते हैं, जिसका अर्थ है कि वे रोमांटिक आकर्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं अनुभव करते। लेकिन उनमें यौन आकर्षण मौजूद हो सकता है। इसलिए रोमांटिक और यौन आकर्षण एक-दूसरे से संबंधित होते हुए भी समानार्थी नहीं हैं।

इस अंतर को समझना विवाह और अंतरंग संबंधों की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। विवाह सामाजिक तथा कानूनी संस्था है। प्रेम भावनात्मक अनुभव है। यौन आकर्षण एक अलग मनोवैज्ञानिक और शारीरिक अनुभव है। कई व्यक्तियों में ये तीनों एक ही संबंध में मौजूद होते हैं, लेकिन यह सार्वभौमिक नियम नहीं है। इसी कारण किसी विवाहित व्यक्ति का यौन रुझान केवल उसके जीवनसाथी के लिंग से निश्चित नहीं किया जा सकता। न ही किसी अविवाहित या ब्रह्मचारी व्यक्ति का यौन रुझान केवल इस आधार पर निर्धारित किया जा सकता है कि उसने अभी तक यौन संबंध नहीं बनाए हैं।

क्या किसी व्यक्ति के चेहरे, कपड़ों या व्यवहार से उसका यौन रुझान पहचाना जा सकता है?

नहीं। किसी व्यक्ति की आवाज़, पहनावा, शारीरिक बनावट, व्यवसाय या व्यवहार से उसके यौन रुझान की विश्वसनीय पहचान नहीं की जा सकती। समाज में स्त्रीत्व और पुरुषत्व से जुड़ी अनेक सांस्कृतिक धारणाएँ होती हैं। कुछ लोग किसी पुरुष के कोमल व्यवहार को समलैंगिकता से जोड़ देते हैं, जबकि किसी महिला की आत्मविश्वासी या परंपरागत रूप से पुरुषोचित मानी जाने वाली शैली को उसके यौन आकर्षण का प्रमाण समझ लेते हैं। ऐसी धारणाएँ वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय नहीं हैं। किसी व्यक्ति की लैंगिक अभिव्यक्ति और उसका यौन रुझान दो स्वतंत्र पहलू हो सकते हैं।

इसी तरह किसी के अतीत के एक अनुभव से उसकी स्थायी पहचान तय करना भी उचित नहीं है। यौन रुझान को समझने के लिए व्यक्ति का व्यापक आकर्षण, उसकी अपनी पहचान और उसके जीवन के वास्तविक अनुभवों को महत्त्व देना चाहिए। कुछ लोग अपनी पहचान सार्वजनिक रूप से व्यक्त करते हैं और कुछ निजी रखना पसंद करते हैं। किसी दूसरे व्यक्ति के अनुमान के आधार पर उनका यौन रुझान घोषित करना उनके निजी जीवन में अनुचित हस्तक्षेप हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र की शब्दावलियाँ भी इस बात पर जोर देती हैं कि लैंगिक अभिव्यक्ति, लैंगिक पहचान और यौन रुझान को एक-दूसरे का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

मोनो, हेटेरो, होमो और बाइ चार समानांतर श्रेणियाँ नहीं, बल्कि आकर्षण समझने के अलग स्तर हैं

यौनिकता मनुष्य के व्यक्तित्व और अनुभव का व्यापक हिस्सा है, जबकि यौन रुझान विशेष रूप से उसके भावनात्मक, रोमांटिक तथा यौन आकर्षण की दिशा से संबंधित है। हेटेरोसेक्सुअल व्यक्ति मुख्यतः अपने से अलग लिंग के व्यक्तियों की ओर आकर्षित होता है। होमोसेक्सुअल व्यक्ति मुख्यतः अपने समान लिंग के व्यक्तियों की ओर आकर्षित होता है। बाइसेक्सुअल व्यक्ति एक से अधिक लिंगों के व्यक्तियों की ओर आकर्षण अनुभव कर सकता है। पैनसेक्सुअल पहचान में दूसरे व्यक्ति के लिंग से स्वतंत्र रूप से आकर्षण की संभावना पर जोर दिया जाता है। एसेक्सुअल व्यक्ति यौन आकर्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं अनुभव कर सकता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘मोनोसेक्सुअल’ इन सबके बीच कोई चौथा समानांतर रुझान नहीं है। वह एक व्यापक वर्ग है, जिसमें केवल एक लिंग के व्यक्तियों के प्रति आकर्षित होने वाले हेटेरोसेक्सुअल और होमोसेक्सुअल लोग आ सकते हैं। इसी तरह ‘नॉन-मोनोसेक्सुअल’ एक से अधिक लिंगों की ओर आकर्षण वाले विभिन्न रुझानों के लिए व्यापक शब्द है। मोनोसेक्सुअल का अर्थ एक साथी के साथ संबंध रखना नहीं है और बाइसेक्सुअल का अर्थ एक साथ अनेक साथियों से यौन संबंध बनाना नहीं है।

आधुनिक मनोविज्ञान यह भी स्पष्ट करता है कि आकर्षण, यौन व्यवहार और आत्मपहचान में अंतर हो सकता है। कोई व्यक्ति किससे विवाह करता है, किसके साथ संबंध बनाता है और भीतर से किसकी ओर आकर्षण अनुभव करता है, ये हमेशा एक जैसे नहीं होते। इसी प्रकार किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान और उसकी यौन पसंद अलग विषय हैं। इसलिए यौन रुझानों की कोई एक अंतिम संख्या निर्धारित करके मानव अनुभव को पूरी तरह समझ लेना संभव नहीं है।

यौन रुझान की वैज्ञानिक समझ का मूल सिद्धांत यह है कि मनुष्य किसकी ओर आकर्षित होता है, यह उसके अस्तित्व का एक पहलू है; उससे उसके चरित्र, नैतिकता, बुद्धिमत्ता, सामाजिक योग्यता या मानवीय गरिमा का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। यौन संबंधों की वास्तविक नैतिक और सामाजिक कसौटी व्यक्तियों की स्वतंत्र सहमति, परस्पर सम्मान, सुरक्षा, ईमानदारी और लागू कानूनों का पालन है। इस दृष्टि से मानव यौनिकता को समझने का उद्देश्य लोगों को किसी कठोर श्रेणी में बाँधना नहीं, बल्कि उनके अनुभवों को सही वैज्ञानिक शब्दावली और अनावश्यक पूर्वाग्रहों के बिना समझना है।

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