टेस्ट क्रिकेट में सभी देशों के खिलाड़ी हमेशा सफेद कपड़े ही पहनते हैं। इसके पीछे कई ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और दिलचस्प कारण छिपे हैं। विक्टोरियन परंपरा को जिंदा रखने के साथ-साथ यह नियम खिलाड़ियों की सहूलियत के लिए भी बहुत जरूरी है।
जानते हैं इसकी कहानी।

आपने कभी ध्यान दिया है कि टेस्ट क्रिकेट में सभी टीमों के खिलाड़ी सिर्फ सफेद यूनिफॉर्म ही पहनते हैं। वनडे (ODI) और टी20 (T20) मैचों में खिलाड़ी रंग-बिरंगी जर्सी पहनते हैं, लेकिन टेस्ट मैचों के लिए सफेद रंग ही चुना जाता है। इसके पीछे ऐतिहासिक, मौसमी और पारंपरिक कारण मौजूद हैं।

टेस्ट क्रिकेट पूरे 5 दिनों तक खेला जाता है। इंग्लैंड में जब क्रिकेट की शुरुआत हुई, तब खिलाड़ियों को कड़ी धूप में दिन भर मैदान पर रहना पड़ता था। विज्ञान कहता है कि सफेद रंग सूरज की गर्मी को सोखने के बजाय रिफ्लेक्ट (Reflects) कर देता है। इससे खिलाड़ियों को ज्यादा गर्मी नहीं लगती और उनका शरीर ठंडा रहता है।

19वीं सदी के विक्टोरियन युग में टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत हुई थी। उस दौर में सफेद रंग को अमीरी और सम्मान का प्रतीक माना जाता था। सफेद रंग आंखों को सुकून देता है, इसलिए इसे जेंटलमैन गेम की आधिकारिक ड्रेस बना दिया गया। साल 1877 में खेले गए पहले आधिकारिक टेस्ट मैच से ही यह परंपरा चली आ रही है।
टेस्ट क्रिकेट में पारंपरिक रूप से लाल रंग की गेंद का इस्तेमाल होता है। खिलाड़ी जब सफेद कपड़े पहनते हैं, तो बल्लेबाज, विकेटकीपर और फील्डर्स को पिच पर लाल गेंद बिल्कुल साफ दिखाई देती है। इससे खिलाड़ियों को गेंद पकड़ने और फील्डिंग करने में काफी मदद मिलती है।

आसान शब्दों में कहें तो यह सिर्फ एक पुरानी परंपरा नहीं है। खिलाड़ियों की सेहत, मौसम के हिसाब से आराम और खेल की क्वालिटी को बनाए रखने के लिए टेस्ट क्रिकेट में सफेद कपड़े पहनने का यह नियम आज भी शान से निभाया जा रहा है।