5 साल में 11 कोच बदल चुका है पाकिस्तान, भारत का वर्ल्ड कप विनिंग कोच भी नहीं टिक पाया

पाकिस्तान क्रिकेट में इस समय भुचाल आया हुआ है। इंग्लैंड दौरे पर टीम का बुरा हाल है। 3 टेस्ट मैच की सीरीज के पहले दो मुकाबलों में बुरी तरह हार झेलने के बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने बड़े बदलाव किए हैं।

आधा दर्जन से ज्यादा खिलाड़ियों के साथ उन्होंने कोचिंग स्टाफ भी भी छुट्टी कर दी है। इंग्लैंड दौरे पर सरफराज खान बतौर हेड कोच और 2009 टी20 वर्ल्ड कप विनिंग प्लेयर उमर गुल बतौर बॉलिंग कोच गए थे। हालांकि टीम के खराब परफॉर्मेंस के बाद पीसीबी ने अपने 7 खिलाड़ियों समेत दोनों कोच को भी वापस बुला लिया है। ऐसे में उन्होंने व्हाइट बॉल कोचिंग सेटअप का हिस्सा रहने वाले माइक हेसन और एश्ले नोफ्को को टेस्ट टीम के साथ जोड़ा है। यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान ने अपने कोचिंग सेटअप में अचानक ऐसे बदलाव किए हो, पिछले 5 सालों में पीसीबी टीम के 11 कोच बदल चुका है। जी हां, इनमें भारत को 2011 वर्ल्ड कप जिताने वाले गैरी कर्स्टन का नाम भी शामिल है।

मिस्बाह उल हक के बाद कोई नहीं संभाल पाया हेड कोच की गद्दी

मिस्बाह उल हक के इस्तीफे के बाद पाकिस्तान टीम के हेड कोच की जिम्मेदारी कोई ज्यादा समय तक नहीं संभाल पाया है। 2019 में कोच बने मिस्बाह ने 2021 में इस्तीफा दिया था। इसके बाद पाकिस्तान टीम को 11 अलग-अलग कोच संभाल चुके हैं, मगर कोई ज्यादा देर इस पोजिशन पर टिक नहीं पाया।

सकलैन मुश्ताक (2021-23)

अब्दुल रहमान (अंतरिम, 2023)

ग्रांट ब्रैडबर्न (2023)

मोहम्मद हफीज (2023-24)

अजहर महमूद (अंतरिम, 2024)

जेसन गिलेस्पी (2024)

गैरी कर्स्टन (2024)

आकिब जावेद (2024)

अजहर महमूद (2025)

माइक हेसन (2025)

सरफराज अहमद (2026)

दखलअंदाजी की वजह से गैरी कर्स्टन ने छोड़ा था पाकिस्तान का साथ

भारत को 2011 वर्ल्ड कप जिताने वाले कोच गैरी कर्स्टन को जब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने अपने साथ जोड़ा था, तो उन्होंने भी उम्मीद लगाई होगी कि कर्स्टन भारत की तरह पाकिस्तान को भी वर्ल्ड चैंपियन टीम बनाएंगे। हालांकि कुछ महीनों बाद ही पीसीबी की जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

गैरी कर्स्टन ने कहा, “जिस बात ने मुझे शायद सबसे ज्यादा हैरान किया, वह थी दखलंदाजी का स्तर। मुझे नहीं लगता कि मैंने पहले कभी इस स्तर की दखलंदाजी देखी है। क्या इससे मुझे हैरानी हुई? मुझे नहीं पता, लेकिन यह काफी ज्यादा थी।

एक कोच के लिए आकर खिलाड़ियों के साथ काम करने का कोई तरीका बनाना काफी मुश्किल होता है, जब बाहर से लगातार शोर-शराबा होता रहता है। यह मुश्किल था और खराब प्रदर्शन वगैरह को लेकर काफी दंडात्मक कार्रवाई भी होती थी।

एक कोच के तौर पर, जब टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही होती, तो सबसे पहले आप ही निशाने पर आते हैं-इसलिए लोग कहते हैं, ‘चलो कोच को हटा देते हैं’ या ‘चलो कोच पर कुछ पाबंदियां लगा देते हैं’, क्योंकि जब टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही होती, तो ऐसा करना ही सबसे आसान होता है-और मेरी नजर में यह उल्टा नुकसानदायक होता है। तो फिर कोच को रखा ही क्यों जाए?”

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